सिर से पांव तक ढकी
एक पाक़ ख़वातीन
काले दस्ताने और
काले आस्तीन
अगली सीट पर ही
गर्म पानी, दूध, चाय
इत्मिनान से चीनी मिलाई
न हाथ दिखे, न ही नाखून
और इस तरह से
उसने एक चाय बनाई
लेकिन अब इस प्याली
और उसके हलक़ के बीच
सदियों की बुनी
एक झीनी मगर
सख्त दीवार थी
घरों की सरहदों के
भीतर बाहर इसी
ज़नाना लिबास पर
एक मर्दाना तक़रार थी
एक झटके में प्याली
उसके होठों तक आ सकती थी
मगर ये काफिराना लुत्फ
वो कहाँ उठा सकती थी
बीच में कुछ एक किताबें
मेहंदी रंगी दाढ़ी के फतवे
हर मर्द की नापाक नज़र
उसपर अनदेखे
जहन्नुम का डर
अपनों का पहरा
जिसमें छुपाना है
अपना ही चेहरा
एक शर्म का पर्दा जिसे
आंखों का बताया गया
इस खातून को पहनाया गया
और मर्दों से हटाया गया
क्योकिं सदियों से
ईमान से भटकने डर है
एक चाय की प्याली
और ये दीवार
इसका ही असर है
तभी उस पाक़ ख़वातीन ने
वो पर्दा हल्के से हटाया
काले लिबास के भीतर
प्याला नज़ाक़त से छुपाया
सुर्र सुर्र की आवाज़ ने
सबकुछ मुझे समझाया
हर रोज़ की तरह फिर उसने
ईमान-ए-कौम बचाया
- रवि मिश्रा