Saturday, November 9, 2019

गांव के दरख़्त

अब जब सीने में यहां
मैं ज़हर भरता हूँ
आहिस्ता हर रोज़ यहां
मैं कमबख्त मरता हूँ
अपने हाथों से
लगाये थे जिनको कभी
गांव में छूटे वो सारे
मैं दरख़्त याद करता हूँ.

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