मैं कहीं नहीं
पहुँचने के लिए
चलता हूँ
सूरज हूँ
हर रोज़ ढलता हूँ
हर रोज़ निकलता हूँ
सफ़र में
रौशनी भी है
बादल भी हैं
इनसे बारहा मिलता हूँ
सूरज हूँ
हर रोज़ जलता हूँ
पर नहीं बदलता हूँ
मुख़्तसर सा नहीं
मेरा सफरनामा
फिर भी नया कहां
कोई कारनामा
एक ही कहानी है
सदियों से मैं कहता हूँ
सूरज हूँ
हर रोज़ ढलता हूँ
हर रोज़ निकलता हूँ
- रवि मिश्रा
पहुँचने के लिए
चलता हूँ
सूरज हूँ
हर रोज़ ढलता हूँ
हर रोज़ निकलता हूँ
सफ़र में
रौशनी भी है
बादल भी हैं
इनसे बारहा मिलता हूँ
सूरज हूँ
हर रोज़ जलता हूँ
पर नहीं बदलता हूँ
मुख़्तसर सा नहीं
मेरा सफरनामा
फिर भी नया कहां
कोई कारनामा
एक ही कहानी है
सदियों से मैं कहता हूँ
सूरज हूँ
हर रोज़ ढलता हूँ
हर रोज़ निकलता हूँ
- रवि मिश्रा
No comments:
Post a Comment