Wednesday, April 3, 2019

हम अनारक्षित हैं .......


ट्रेन के जिस डिब्बे में
सबसे ज्यादा भीड़ हो
और एक दूसरे पर चढ़ते हुए
किसी तरह एक सफर
 तय कर जाना हो
वो यात्रा उनकी है जिसे
सरकारी तंत्र कहता है
जनरल यानि अनारक्षित

वहां जहाँ  सबसे ज्यादा
मेहनत, अंक और कीमत
लगाने पर ही कुछ मौके
 हो सकते हों अपेक्षित
पुरखो की ईएमआई है
चुकाओ इसे न हो व्यथित
सामाजिक न्याय का  कर्ज़ है
जनरल यानी अनारक्षित

मैं मानता हूँ कि
साहब के परदादा के साथ
बहुत जुल्म मेरे परदादा ने किया
पर साहब इसका प्रतिशोध
मेरे बच्चे का निवाला छीन
आपने क्यों लिया
आपके पुरखे थे वंचित
अब मेरी पीढियां हैं
जनरल यानि अनारक्षित

अजब रेस बनाई है आपने
जो दौड़ भी न पाएं
उनपर ही बाज़ी लगाई है आपने
और फर्क कैसा किया है आपने
भूख को भूख से बांट दिया है आपने
बेरोज़गार भी यहां दो तरह के हैं
अधिकार भी यहां दो तरह के है
कानून भी अजीब हुआ जाता है
एकतरफा न्याय दिया जाता है
आपकी पैदाइश बताई तो जेल है
और हमारे पुर्वजों के लिए गालियां
अब यही डेमोक्रेसी का पवित्र खेल है
निंदा, अन्याय, उपेक्षा
उसपर भी सबसे कठिन परीक्षा
तब भी हम ही कहलाते शोषक
और साहब आप
आप तो आने वाले युगों तक वंचित है
क्या करें हम जो
जनरल यानी अनारक्षित हैं

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