Thursday, December 5, 2013

उम्मीदों का जनप्रतिनिधी

एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो
जो जन के जीवन से जुड़ा हो
जो वचनों से नहीं कर्म से पूरा हो
वो जो राष्ट्र के उत्थान की सोचे
वो जो बेघर के मकान की सोचे
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो...
 
ऐसा जो मुकरे नहीं वादों से
ऐसा जो अटल हो अपने हो इरादों से
जो  करे बात हमारी तुम्हारी
जिसे ने लगे भ्रष्टाचार की बीमारी
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो...
 
जो जुड़ा हो सच के जहान से
जिसकी सोच मिलती हो तरक्की के आसमान से
जिसके हाथ हर मजलूम के लिए सहारा हों
जो हर डूबती उम्मीद का किनारा हो
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो......
 
वो जो बदले तस्वीर समाज की
वो जो बने प्रतिछाया जनता के राज की
जो साहस में हिमालय हो
जिसका हृदय करूणा का देवालय हो
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो
 
जिसके पदचिन्हों पर चलने को उबले युवा रक्त
जिसके एक एक वचन का हर मन हो आसक्त
कर्म से श्रेष्ठ जिसके लिए कोई धर्म न हो
जन सेवा से पृथक जीवन का कोई मर्म न हो
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो
 
- रवि मिश्रा ( 06.12.2013)
 
 

Sunday, October 27, 2013

ले चल अपना तीर..


ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर
जग के घाट पर
बइठल-बइठल
सूखे अंतर नीर

ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...


ना कोई संगी
ना कोई साथी
अब ना रहल कोई मीत
सांस से जीवन
छूटत जाए
जीवन से छूटे धीर

ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...

देह के भार बा
मोह के भार ब
बाटे माया सघन
बोझ सहल ना जाए अब त
माटी भएल शरीर

ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...

                - रवि मिश्रा( 27.10.13)



Sunday, October 13, 2013

मनवा चल तू धीरे-धीरे


घाटे-घाटे 
तीरे-तीरे

मनवा चल तू
धीरे-धीरे...

सहर-गांव में
बन फकीरे

मनवा चल तू 
धीरे-धीरे...

आस रहे
विस्वास रहे

पग -पग पर
उल्लास रहे

बाजे झाल
ताल खंजीरे

 
मनवा चल तू
 
धीरे-धीरे....

भोर भोर में
पोर पोर में

राग रंग में
अंग अंग में

मंद मंद
कुछ मधुर बहे रे

मनवा चल तू 
धीरे-धीरे...

ना सवाल बा
ना जवाब बा

बस खयाल बा
उ कमाल बा

अंगना दुआर आउर
घर के सांझ रे

मनवा चल तू
धीरे-धीरे


                                     -
रवि मिश्रा



न आएल अंजोरिया

बरस-बरस कर दिन बीते
बीते न रात अनहरिया
झुरियाएल अब आंख के पपनी
अमावस के बाद ना आएल अंजोरिया

हार के बाद जीत होएला
प्रेम से ही त प्रीत होएला
हाथ से हाथ बढ़ाव त
जग में हर कोई मीत होएला
कहां बा अइसन संसार
जहां मिले अइसन नीक नजरिया
अमावस के बाद न आएल अंजोरिया

जबतक कोनों आस ना रले
तबतक कंठ में पियास न रले
ना रले कोनों अभिलाषा
निष्प्राण मन में विश्वास न रले
उम्मीद कोनों ना टूटे जहां
कहां मिली हमरा उ दुअरिया
अमावस के बाद न आएला अंजोरिया

 कह द जाके कोई स्वप्न न देखे
टूट जाए अइसन उम्मीद न रखे
देह के मरण त एकबार ही होला
मन के मृत्यु न दुनिया देखे
जुग जुग से बंद बा मन इ कोठरिया
अमावस के बाद न आएला अंजोरिया

                          - रवि मिश्रा( 13.10.2013)










Wednesday, October 2, 2013

फिर से तू आजा....




फिर से सपना कोई दिखा द
फिर से प्यार जता द
सूखल-सूखल डाली पर फिर से
प्रेम के फूल खिला द


फिर आव एक बार सही
कुछ आपन तू मन कह
कुछ हम मन के बात कहीं
फिर से तू जीवन महका द
फिर से हमरा के बहका द
मन के अंगना में फिर से
सुख के एगो दीप जला द


दूर सांझ के बेला देख
भारी-भारी मन हो जाए
अंत के ओर बढ़े सबकुछ
रात के जइसन जीवन हो जाए
फिर से तू चंदा बन के
अंजोरिया में हमरा के नहा द
सांस में जीवन बा हमरा
मन के इ एहसास दिला द

                    - रवि मिश्रा (02.10.2013)






Wednesday, September 18, 2013

मशाल जलत रहे भाई

अभी त रात बाकी बा
अभी मशाल जलत रहे भाई
अभी सफर पूरा कहां
रुके न गोर चलत रहे भाई
 
आस छलनी,विश्वास छलनी
काठ से कठोर भाग्य
आउर मानस के प्रयास छलनी
अंत तक जे माने न हार
विजय ओकर ही सतत रहे भाई
अभी मशाल जलत रहे भाई

 जे चलेला उहे गिरेला
जे लड़ेला उहे हारेला
घाट पर बईठल मुसाफिर
पार ना हो पाएला
धार से लड़के ही नाव बढ़त रहे भाई
अभी मशाल जलत रहे भाई

 मन के भीतर जहां उजाला
बाहर अंधेरा कहां रहेला
आस पर जेकर बा उडान
उहे उठल बा, युग प्रमाण
त अंजोर आसा के फइलत रहे भाई
अभी मशाल जलत रहे भाई

                                        - रवि मिश्रा (18.09.2013)



Sunday, September 8, 2013

संसद


हर खंभा
एक- एक ईटा
नेव से लेके
छत दीवार
भवन ना ह
सपना ह
जे ना भईल
अबतक साकार

बलिदान के पथ
लोक के रथ
जहां पहुंचल
जनमानस जनमत
हर कंठ उहां तक
स्वर उठावे
जोर लगावे
शोर मचावे
पर ए भवन के
कान कहां
जनता के इंहा
ध्यान कहां

हर दरवाजा
खिड़की बा बंद
लोकशाही के
इहां धार बा कुंद
नाम के बस
संसद कहल जाला
जहां जन से
तंत्र अलग हो
उहे व्यवस्था
थोपल जाला

हंगामा बस
हल्लागुल्ला
इहां खेल बा
खुल्लम खुल्ला
लोकतंत्र के पहरेदार
रक्षक जेकरा के
मानल गएल
उहे सेवक भक्षक बनल
उम्मीद से जेके
पेठावल गएल

देंखी धरती के
धीरज कब टूटेला
देंखी फरेब के
इ कोढ़ कब छूटेला
जन सैलाब
इ जनविशाल
कब जागेला भ्रम से
हर जन बन सैनिक
डट जाए अब रण में
आस के इ भवन
फिर हो जाए पवित्र
लोक के मिल जाए सम्मान
तंत्र के ठीक हो जाए चरित्र


- रवि मिश्रा( 08.09.2013)

Tuesday, August 20, 2013

प्रश्न


जे ना पाइल हक-हकूक
सहत रहल रौब-रसूख
जे ना भइल कभी बराबर
भोगत रहल सदा निरादर

उ हृदय ना मनाई जश्न
उ हृदय उठाई प्रश्न

बीतत गएल बरस-बरस
जन-गण के मन तरस-तरस
सिकुड़ल पेट ना भोगे अन्न
ढ़क ना पाएल उघाड़ तन

दरिद्रता के ना लगाई भस्म
उ ह़दय उठाई प्रश्न

चुपचाप न रह पाई उ अब
गुमनाम न बन जाई उ अब
अब समय के धार मोड़ दी
शुष्क शिला पर प्रहार छोड़ दी

ना ढोई शोषण के रस्म
उ हृदय उठाई प्रश्न

रवि मिश्रा- 20.08.13










Friday, August 9, 2013

याद के जंगला

अढ़उल के फूल पर जइसे
भोर बिहाने फिर ओस अंघुआए
बांस के कोपर में जइसे
कोई मुंहवा छुपाए, शरमाए

तन-मन चमक जाए
पियरी माटी से जइसे
सबकुछ गमक जाए
बगईचा के मोजर से जइसे

फगुआ,सोहर,चइता सबकुछ
जइसे बसे फिर हर मन में
परदेस में देस के रंगत
ना छूटे इ तन से

जनसमुद्र के पार कहीं से
जइसे गंगाजी बुलावे ली
जइसे आपन पानी से
मन के रोज भिगावे ली

उहे बथानी, उहे मड़ईया
उहे झुंड, सब साथी भईया
खेत बघार, उ घर दुआर
छूट गईल गंउवा के दुलार

सच सब बा, सब सपना बा
ना होके भी, अपना बा
रह रह के झांके, मन डोले
उड़ जाए के चाह में इ अब
याद के जंगला खोले

           - रवि मिश्रा ( 0908.2013)

















Monday, July 1, 2013

हिमायल तू पत्थर है




हे हिमायल !
सच है, तू पत्थर है

तेरे देश में सबकुछ तो होता है
पर तू न हिलता है , न रोता है
न हर्ष, न क्रंदन
अविचलित, न स्पंदन

जो टूटा नहीं तो बरसों बरस
टूटा तो दुखों के पहाड़ सा इस बरस

देव, दानव और मानव
कहां किसी पे दया की  तूने
शवों का अंबार
मृत पाषाण, शुष्क प्रस्तर है

हे हिमायल !
सच है तू पत्थर है

दया, याचना, रूदन
सबकुछ किया  होगा
पर तेरे श्रवण पिंडो से टकराकर
सबकुछ खाली लौटा होगा

सत्य है तेरी शैल त्वचा को छील रहा है मानव
मंद मंद तेरी ही संपदा लील रहा है मानव

किंतु क्षणभर को सोचा तो होता
हे विशाल ! पलभर रोका तो होता
दंड ये तेरा कैसा ?
कैसा कठोर ये उत्तर है

हे हिमायल !
सच है तू पत्थर है
                          - रवि मिश्रा 02.07.2013

Saturday, June 29, 2013

कितने आजाद ?



आज़ाद सा कोई लब
आजाद सा कोई रब
कई दिनों से मिला नहीं
गुलाम हूं मैं भी
सो कोई गिला नहीं

नसों में दौड़ता लहू
अरसे से लाल नहीं
सपनों की कब्र हर रोज बनाते हैं
यहां अब इसका मलाल नहीं

अभी किसी ने कहा
इक बार मरो हर रोज नहीं
अभी तो उसने मरना शुरू किया ही होगा
उसका कोई दोष नहीं

मेरे आगे की नस्लें
ज़जीरों में जकड़ी क्यूं नजर आती हैं
अरे दीवाना हूं मैं भी
वही ज़जीरें मुझे भी तो हर रोज खाती हैं

खुदा तो है कहीं
ये यकीन छोड़ा नहीं अबतक
कोई करिश्मा नहीं करेगा वो
तो ये यकीन भी रहेगा कबतक

बात रोटी की होती
तो गरीबी भी चुप ही रहती
बात भूख की है
जो अमीरी की कभी नहीं मिटती

दिया तेरे घर में रौशन जो होता
तो मेरे उजालों को भी नजर न लगती
फिर न सड़कों पर हर बात पे हंगामा होता
मेरी आवाज भी फिर बेअसर न लगती

                                     - रवि मिश्रा- 30-6-2013







Friday, June 28, 2013

डॉन्कीक्रेसी



गधर्व देश की गधा महापंचायत बैठी हुई थी.छोटे-बड़े, अमीर, गरीब, पत्रकार, वकील, दबंग आदि-आदि सभी मौजूद थे.मुखमंडल पर गंभीर आभा.विषय भी गंभीर.गर्धव देश के तमाम राजनीतिक दल और समूह भी मौजूद थे.आज तय होना था कि दूसरे देशों के लगातार हो रहे हमलों से निपटने के लिए क्या किया जाए ? रोज-रोज बाहरी आक्रमण हो रहे थे.आतंकी जानवर देश में आतंक फैला रहे थे. गधों की जंगल में कोई इज्जत नहीं रह गई थी. गधर्व आत्मसम्मान को भारी धक्का लगा था.

दरअसल गधर्वदेश जंगल का सबसे बड़ा डेमोक्रेटिक देश था.गधों को मूखर्ता का प्रतीक माना ही जाता है.अहिंसक और लेबोरियस तो वो नेचर से होते ही है. इनके पुरखों ने जब डेमोक्रेसी के विषय में ये सुना कि डेमोक्रेसी को मूर्खों की सरकार भी कहा जाता है, तभी ये तय कर लिया कि इस देश में डेमोक्रेसी ही होगी क्योंकि पूरे जंगल में मूर्खता का असली प्रतीक तो गधर्वदेश के गधे ही हैं.सो तब से डॉन्कीक्रेसी को डेमोक्रेसी में तब्दील कर दिया गया. लेकिन शांत, अहिंसावादी, दूसरों पर हमला नहीं करने वाले गधर्वदेश के नागरिकों को क्या पता था कि उनकी इस खूबी को जंगल के दूसरे देश मसलन सिंहआइना, लोमेरिका और खासकर पड़ोसी देश फॉक्सिस्तान कमजोरी समझेंगे और इन्हें परेशान करेंगे.घास चबाने वाले ये गधे कई बार इनकी चालों का शिकार हुए. हद तो ये हो गई कि सिंहआइना और फॉक्सिस्तान आपस में मिल गए और उनके इशारों पर गधर्वदेश में हर रोज आतंकी हमले होने लगे. इसी गंभीर मुद्दे पर आज गधा महापंचायत बुलाई गई थी . गधों ने तय किया कि देश के तमाम दल यहां जुटेंगे और एकराय कायम करेंगे कि कैसे राष्ट्र पर आई इस विपदा से निपटा जाए.

बहरहाल बैठक की अध्यक्षता गधों के चुने हुए, देश के मुखिया चुप्पा चोर सिंह कर रहे थे.ये अपने नाम के अनुरूप थे. देश में सारी चोरी इन्हीं की देखरेख में होती थी लेकिन वो चुप रहते थे.इनकी चुप्पी को देशभर में ईमानदारी और सज्जनता का प्रतीक माना जाता था.देश के कई हिस्सों के मैदानों की घास गायब हो रही थी और उसकी कालाबाजारी की जा रही थी.गधे भूखों मर रहे थे.कई इलाकों में तो गरीब गधे परिवार समेत आत्महत्या भी कर रहे थे.लेकिन मुखिया चुप्पा चोर सिंह चुप चाप देखते रहते. कभी जब मुंह खोलते तो एक ही बात बोलते- ढेंचू...ढेंचू...ढेंचू....जल्द ही सब ठीक हो जाएगा...आप भरोसा रखिए...सरकार अच्छा काम कर रही है ...ढेंचू..ढेंचू..ढेंचू...पिछले 10 सालों से हर सवाल का वो यही जवाब दे रहे थे.

सभा कि शुरूआत गधर्वदेश के पारंपरिक गान से हुई...सभी गधे खड़े हो गए....सिर आकाश की तरफ उठाया...आंखे बंद...एक सुर में- ढेंचू....ढेंचू....ढेंचू.... गान के बाद अब बारी थी उस विषय पर चर्चा की जिसके लिए सभा बुलाई गई थी...विपक्ष की पार्टी ऑल गदेपा, यानि ऑल गधर्व देश पार्टी, जो कंजरवेटिव विचारधारा के करीब थी ,जो गधों के शुद्ध रक्त की विचारधारा का समर्थक मानी जाती थी और उसमें ज्यादातर वो लोग थे जो डॉन्कीक्रेसी के जमाने की बातों के पक्षधर थे. ऑल गदेपा ने आरोप लगाया कि एक जमाने में गधों का बोलबाला था.हमारी लताड़ में कितनी ताकत थी.गधों की अस्मिता कितनी उंची और महान थी.इतिहास गवाह है कि एक झुंड में जब हम चलते थे तो मजाल है कि कोई हमला करने की सोचे.ये केवल इस लिए था क्योंकि उस समय हमारी नस्लें ठीक थीं और हमारी टांगों में इतनी ताकत थी कि हमारी लताड़ से जंगल का हर आतंकी जानवर डरता था.हमें फिर से गधों के उसी सुनहरे काल की ओर लौटना होगा.हमारे गधेपन का फायदा उठाकर गधों की अजीब-अजीब नस्लें यहां आकर रहने लगी और आज हालत ये है कि फॉक्सिस्तान जैसे देश जिसकी कोई औकात नहीं थी वो भी हमारे लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं.हमारी मांग है कि गधों की शुद्ध नस्लों को बढ़ावा दिया जाए और हर जगह लताड़ ट्रेनिंग सेंटर खोला जाए ताकि हम लड़ाकू गधों की एक नस्ल तैयार कर सकें.इनता सुनना था कि चूकिया पंथी गधे उठ खड़े हुए और जोर-जोर से ढेंचू-ढेंचू-ढेंचू करने लगे .सभा में शोर होने लगा.कोई किसी को सुनने को तैयार नहीं था.पर देश के मुखिया चुप्पा चोर सिंह जी विनम्र भाव में, एक इंटलेक्चुल की तरह मुस्कुराते रहे और गधों के प्रतिनिधियों को आपस में ढेंचू- ढेंचू करते देखते रहे.

किसी तरह से थोड़ी देर में आपसी ढेंचू-ढेंचू बंद हुआ तो चूकिया पंथी  नेताओं ने कहना शुरू किया.लेकिन ये भी जानिए कि इन्हे चूकिया पंथी क्यों कहा जाता है.दरअसल ये दोनों ही व्यवस्थाओं के खिलाफ है.डेमोक्रेसी और डॉन्कीक्रेसी.इनका मानना है कि दोनों ही व्यवस्थाएं गजुर्वा(संभ्रात) वर्ग के हितों की रक्षा करती है, जबकि गधर्वहारा(आम ,कमजोर गधे )  वर्ग का हमेशा से ही शोषण होता आया है .रक्त शुद्धता के नाम पर एक तरफ जहां देश में गधों में फर्क पैदा किया गया वहीं डेमोक्रेसी के नामपर आम गधों को बेवकूफ बनाया गया.चूकिया पंथी सिंहाआइना के शासनतंत्र के समर्थक माने जाते थे.उनका कहना था कि वहां हर नागरिक सिंह है.कोई फर्क नहीं है.यही वजह है कि आज वो सबसे मजबूत हैं. हमें उनसे दोस्ती करनी चाहिए. उनके लिए भोजन का इंतजाम करना चाहिए. हमारी तादाद इतनी है कि अगर कुछ रेग्युलर बेसिस पर दे भी दें तो कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा और देश में शान्ति बनी रहेगी.

आम गधा जन ने आज तक चूकिया पंथियों को पूरी तरह से अपनाया नहीं.उन्हें डर था कि सत्ता में आने के बाद ये लोग देश को सिंहाआइना के भरोसे छोड़ देंगे.जनता चूकिया पंथियों को कभी पूरी तरह से वोट नहीं देती थी.वो हर बार सत्ता से चूक जाते थे.वो चूके हुए लोग थे, यही वजह है कि उन्हे चूकिया पंथी कहा जाता था.

इधर चुप्पा चोर सिंह चुप चाप सब सुन रहे थे.बीच-बीच कुछ समाज सेवी और पत्रकार भी चिल्ला रहे थे. नेताओं के खिलाफ नारे लग रहे थे. आम गधों में काफी गुस्सा था.पंचायत भवन के बाहर हंगामा चल रहा था.हर तरफ बेचैनी थी कि इस महापंचायत में क्या फैसला होगा ? हर रोज के हमलों और अपमान से जनता त्रस्त थी. इसी बीच कुछ और छोटे दलों ने जो अमूमन मौका परस्त थे और अपने हितों के हिसाब से बात करते थे अपनी बात रखी. उनके पास कुछ खास कहने को नहीं था. अंदरखाने चुप्पा चोर सिंह की पार्टी से मिले हए थे सो इधर –उधर की बात की. हमेशा की तरह उंचे सुर में ढेंचू-ढेंचू किया और फिर शांत हो गए.

 

अब आखिर में चुप्पा चोर सिहं को फैसला देना था. पर वो तो अपनी तबियत के अनुसार कोई फैसला- वैसला तो लेते नहीं थे. उनका हर फैसला आउटसोर्सड होता था. वो उठे , बडी ही मधुरता के साथ पहले ढेंचू-ढेंचू किया, फिर बोले- मेरे प्यारे भाईयों और बहनों जैसा कि आपको पता है, आज गधों के देश में बाहरी हमले एक बड़ी चुनौति हैं. सबके मन में यहीं चिंता है कि जंगल के सबसे बड़े डेमोक्रेटिक नेशन को कैसे बचाया जाए. बैठक से पहले मैने लोमेरिका के मुखिया लोबामा से बात की और अपनी चिंताएं ऱखीं. आपको तो पता ही है कि लोमेरिका की नीति आज सबसे सफल नीति है. लोबामा ने कहा कि आज से कोई भी लोमड़ी गधों पर हमला नहीं करेगी जबतक कि उसे भूख न लगे. बेवजह किसी का खून नहीं बहेगा और किसी सिंहाइना या फॉक्सिस्तान ने ऐसा किया तो लोमेरिका गधर्वदेश के साथ है. बस हमारे हितों का ध्यान रखा जाए. वैसे भी हमने ऐसे देशों को हिंसक और जंगल के शैतानों की धुरी करार दे दिया है.अब से कुछ शर्तों के साथ गधर्वदेश और लोमरिका हर चुनौति का सामना साथ साथ करेंगे. दोनों घनिष्ठ मित्र हैं.

विपक्षी पार्टी ऑल गदेपा के मुखिया चुप थे.भई सत्ता का स्वाद वो भी ले चुके थे.घनिष्ठ मित्रता का मतलब वो जानते थे.ये शब्द सुनते ही उनकी आंखों में लोमेरिका देश में दूर दूर तक फैली स्वादिष्ट, हरी –हरी और मुलायम घास की तस्वीर खिंच गई.मुंह में पानी आ गया. आहा.. हा..हा... हा ...क्या दिन थे वो.10 साल से तो नसीब ही नहीं हुआ.साला ये चुप्पा चोर सिहं और उसी फौज लोमेरिका जा कर छक कर मजे लेते है. और हम यहां देसी घास खा रहे हैं.पर क्या करें सत्ता में आने  तक लोबामा ने चुप रहने को कहा है.नहीं तो देश में बैठे – बैठे छठे छमाही उनकी तरफ से जो हमें थोड़ी बहुत घास कॉन्फिडेंस बिल्डिंग के नाम पर मिल जाती है वो भी नहीं मिलेगी.

पर दूसरी ओर चूकिया पंथियों को लोमेरिका फूटी आंख नहीं भाता. उन्होने हंगामा शुरू कर दिया तो चुप्पा चोर सिंह ने कहा कि ज्यादा ढेंचू-ढेंचू करने की जरूरत नहीं है हमने अपना एक–एक प्रतिनिधी मंडल सिंहआइना और फॉक्सिस्तान भेजा था. वो आगे बोले- सिंहाइना ने तो कहा है कि हम भी आपके यहां अपने नेता भेजेंगे. उनकी अच्छी खातिरदारी किजिएगा. कोई कमी न रहे. फिर हम कोई विचार करेंगे. तबतक स्टेटस क्यो यानि यथावत स्थिति बनी रहेगी.चुप्पा चोर सिंह ने पंचायत को ये जानकारी दी कि अगर सिंहआइना का गधर्वदेश की ओर से कोई विरोध नहीं किया गया तो बदले में सप्ताह के दो दिन उनकी ओर से किसी भी तरह का हमला नहीं होगा. गरदन थोड़ी उंची कर चुप्पा चोर सिंह ने आगे कहा - ये हमारी सरकार कि बड़ी उपल्बधि है.इससे गधों पर हो रहे हमलों में कमी आएगी.चूकिया पंथियों ने इस कदम का जोरदार स्वागत किया.

 

इस बीच विपक्षी पार्टी ऑल गदेपा के नेता ने उठकर कहा कि सबसे खतरा तो बगल के छोटे से देश फॉक्सिस्तान से है. उनका भरोसा नहीं किया जा सकता. उन्हें सबक सिखाना होगा. इस सवाल पर चुप्पा चोर सिंह जी ने कहा-  फॉक्सिस्तान से हमने कड़े शब्दों में कहा है कि वो केवल नैचुरल डेथ वाले गधों को खा सकते हैं. हमले की इजाजत उन्हें नहीं है. अगर ऐसा हुआ तो गधों की फौज को लताड़ चलाने का हुक्म दे दिया जाएगा वो भी फॉकिस्तान के घर में घुस कर. फॉक्सितान ने अमन बहाली के लिए हमारी बात को मान लिया है .

सभा समाप्त हुई.प्रेस के सामने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी गई कि कैसे सभी देशों ने भरोसा दिलाया है कि गधर्वदेश पर बेवजह हमले नहीं होंगे और कैसे सरकार ने सफल कोशिश की है ताकि एक ज्यादा सुरक्षित गधर्वदेश बनाया जा सके. जहां तक देश के अंदर नए कानून बनाने की बात है तो आज से पूरे देश में राइट टू लताड़ दिया जाएगा.इसके लिए ट्रेनिंग सेंटर खोले जाएंगे, जिसमें सभी को ट्रेनिंग दी जाएगी कि कैसे लताड़ कौशल से सिंह या लोमड़ी के हमलों को नाकाम किया जा सकता है.जनता थोड़ी कन्फ्यूज थी कि लताड़ से नखों, पंजों और नुकीले दांतो का सामना कैसे किया जाएगा ? फिर भी आम गधों के पास कोई चारा तो था नहीं.सो अधूरे विश्वास के साथ ये फैसला मान लिया गया .

एक महीने बाद.गधर्वदेश में हहाकार मचा हुआ था.सिंहआइना के हमले पहले से ज्यादा हो गए क्योंकि उसने दो दिन हमले न करने के नाम पर सप्ताह के पांचों दिन दुगने हमले किए. पांच दिन का लाइसेंस उनके पास था सो उन्हें अब रोका नहीं जा सकता था.दूसरी ओर लोमरिका का लालच सातवें आसमान पर था.अपने हितों के नाम पर वो आए दिन तरह-तरह के बहाने बनाकर गधों का शिकार कर रहे थे और उसे जस्टिफाय भी कर रहे थे. हद तो फॉक्सिस्तान ने कर दी थी. उसके यहां के हमलावर दूसरे जानवरों भेष में आकर प्रॉक्सी वॉर कर रहे थे.पता ही नहीं चल पा रहा था कि असल में  वो हैं कौन ? साथ ही वो सिंहाइना और लोमरिका के छोड़े हुए शिकार का भी आनंद उठा रहे थे. इधर चुप्पा चोर सिंह अपनी टीम के साथ अपनी उपलब्धियों का बखान पूरे गर्धव देश में घूम –घूम कर रहे थे.दरअसल इसी बहाने वो देश के अलग-अलग इलाकों के घास का आनंद ले रहे थे. इधर चूकिया पंथी सिंहाइना के घास का आनंद ले रहे थे क्योंकि उन्होंने सिंहाइना के प्रेसिडेंट को कनविंस कर लिया था कि मौजूदा व्यवस्था उनकी कोशिशों की वजह से हैं.साथ ही उन्होंने लताड़ ट्रेनिंग को फेल करने का नुस्खा भी दिया था सिंहाइना को.गधों पर पीछे से नहीं सामने से उनकी गरदन पर हमला करें.बस क्या था एक भी हमला नाकाम नहीं जा रहा था .ऑल गदेपा ये सारा माजरा देख रही थी.सबकुछ जानते हुए भी चुप थी.अच्छा ही था चुप्पा चोर सिहं की सरकार बदनाम होकर गिर जाएगी तो उन्हें ही सत्ता मिलेगी.और फिर लोमेरिका के हरे हरे , मुलायम घास के मैदान.बहरहाल शायद जनता गधी थी इसीलिए वो ये सब भोगने को मजबूर थी क्योकि उन्होंने डॉन्कीक्रेसी को अंदर से अबतक अपना रखा था.डेमोक्रेसी को समझने की कोशिश ही नहीं की. नतीजा गधर्वदेश को ऐसे नेता और मुखिया मिलते रहे.

 

-         रवि मिश्रा

27.06.2013