Friday, August 9, 2013

याद के जंगला

अढ़उल के फूल पर जइसे
भोर बिहाने फिर ओस अंघुआए
बांस के कोपर में जइसे
कोई मुंहवा छुपाए, शरमाए

तन-मन चमक जाए
पियरी माटी से जइसे
सबकुछ गमक जाए
बगईचा के मोजर से जइसे

फगुआ,सोहर,चइता सबकुछ
जइसे बसे फिर हर मन में
परदेस में देस के रंगत
ना छूटे इ तन से

जनसमुद्र के पार कहीं से
जइसे गंगाजी बुलावे ली
जइसे आपन पानी से
मन के रोज भिगावे ली

उहे बथानी, उहे मड़ईया
उहे झुंड, सब साथी भईया
खेत बघार, उ घर दुआर
छूट गईल गंउवा के दुलार

सच सब बा, सब सपना बा
ना होके भी, अपना बा
रह रह के झांके, मन डोले
उड़ जाए के चाह में इ अब
याद के जंगला खोले

           - रवि मिश्रा ( 0908.2013)

















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