अढ़उल के फूल पर जइसे
भोर बिहाने फिर ओस अंघुआए
बांस के कोपर में जइसे
कोई मुंहवा छुपाए, शरमाए
तन-मन चमक जाए
पियरी माटी से जइसे
सबकुछ गमक जाए
बगईचा के मोजर से जइसे
फगुआ,सोहर,चइता सबकुछ
जइसे बसे फिर हर मन में
परदेस में देस के रंगत
ना छूटे इ तन से
जनसमुद्र के पार कहीं से
जइसे गंगाजी बुलावे ली
जइसे आपन पानी से
मन के रोज भिगावे ली
उहे बथानी, उहे मड़ईया
उहे झुंड, सब साथी भईया
खेत बघार, उ घर दुआर
छूट गईल गंउवा के दुलार
सच सब बा, सब सपना बा
ना होके भी, अपना बा
रह रह के झांके, मन डोले
उड़ जाए के चाह में इ अब
याद के जंगला खोले
- रवि मिश्रा ( 0908.2013)

No comments:
Post a Comment