Wednesday, October 2, 2013

फिर से तू आजा....




फिर से सपना कोई दिखा द
फिर से प्यार जता द
सूखल-सूखल डाली पर फिर से
प्रेम के फूल खिला द


फिर आव एक बार सही
कुछ आपन तू मन कह
कुछ हम मन के बात कहीं
फिर से तू जीवन महका द
फिर से हमरा के बहका द
मन के अंगना में फिर से
सुख के एगो दीप जला द


दूर सांझ के बेला देख
भारी-भारी मन हो जाए
अंत के ओर बढ़े सबकुछ
रात के जइसन जीवन हो जाए
फिर से तू चंदा बन के
अंजोरिया में हमरा के नहा द
सांस में जीवन बा हमरा
मन के इ एहसास दिला द

                    - रवि मिश्रा (02.10.2013)






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