ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर
जग के घाट पर
बइठल-बइठल
सूखे अंतर नीर
ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...
ना कोई संगी
ना कोई साथी
अब ना रहल कोई मीत
सांस से जीवन
छूटत जाए
जीवन से छूटे धीर
ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...
देह के भार बा
मोह के भार ब
बाटे माया सघन
बोझ सहल ना जाए अब त
माटी भएल शरीर
ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...
- रवि मिश्रा( 27.10.13)

No comments:
Post a Comment