Sunday, October 27, 2013

ले चल अपना तीर..


ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर
जग के घाट पर
बइठल-बइठल
सूखे अंतर नीर

ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...


ना कोई संगी
ना कोई साथी
अब ना रहल कोई मीत
सांस से जीवन
छूटत जाए
जीवन से छूटे धीर

ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...

देह के भार बा
मोह के भार ब
बाटे माया सघन
बोझ सहल ना जाए अब त
माटी भएल शरीर

ओ रे मांझी
ले चल अपना तीर...

                - रवि मिश्रा( 27.10.13)



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