Sunday, September 8, 2013

संसद


हर खंभा
एक- एक ईटा
नेव से लेके
छत दीवार
भवन ना ह
सपना ह
जे ना भईल
अबतक साकार

बलिदान के पथ
लोक के रथ
जहां पहुंचल
जनमानस जनमत
हर कंठ उहां तक
स्वर उठावे
जोर लगावे
शोर मचावे
पर ए भवन के
कान कहां
जनता के इंहा
ध्यान कहां

हर दरवाजा
खिड़की बा बंद
लोकशाही के
इहां धार बा कुंद
नाम के बस
संसद कहल जाला
जहां जन से
तंत्र अलग हो
उहे व्यवस्था
थोपल जाला

हंगामा बस
हल्लागुल्ला
इहां खेल बा
खुल्लम खुल्ला
लोकतंत्र के पहरेदार
रक्षक जेकरा के
मानल गएल
उहे सेवक भक्षक बनल
उम्मीद से जेके
पेठावल गएल

देंखी धरती के
धीरज कब टूटेला
देंखी फरेब के
इ कोढ़ कब छूटेला
जन सैलाब
इ जनविशाल
कब जागेला भ्रम से
हर जन बन सैनिक
डट जाए अब रण में
आस के इ भवन
फिर हो जाए पवित्र
लोक के मिल जाए सम्मान
तंत्र के ठीक हो जाए चरित्र


- रवि मिश्रा( 08.09.2013)

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