आज़ाद सा कोई लब
आजाद सा कोई रब
कई दिनों से मिला नहीं
गुलाम हूं मैं भी
सो कोई गिला नहीं
नसों में दौड़ता लहू
अरसे से लाल नहीं
सपनों की कब्र हर रोज बनाते हैं
यहां अब इसका मलाल नहीं
अभी किसी ने कहा
इक बार मरो हर रोज नहीं
अभी तो उसने मरना शुरू किया ही होगा
उसका कोई दोष नहीं
मेरे आगे की नस्लें
ज़जीरों में जकड़ी क्यूं नजर आती हैं
अरे दीवाना हूं मैं भी
वही ज़जीरें मुझे भी तो हर रोज खाती हैं
खुदा तो है कहीं
ये यकीन छोड़ा नहीं अबतक
कोई करिश्मा नहीं करेगा वो
तो ये यकीन भी रहेगा कबतक
बात रोटी की होती
तो गरीबी भी चुप ही रहती
बात भूख की है
जो अमीरी की कभी नहीं मिटती
दिया तेरे घर में रौशन जो होता
तो मेरे उजालों को भी नजर न लगती
फिर न सड़कों पर हर बात पे हंगामा होता
मेरी आवाज भी फिर बेअसर न लगती
- रवि मिश्रा- 30-6-2013
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