कहंवा के माटी, कहंवा के पानी
कहंवा के पावक, गगन, पवन
एक भएल सब बनल देह
चरखा लागल जनम-जनम
काया के बा रूप अनंत
माया के बा रूप अनंत
आस-पियास त बढ़त गएल
मिट न पाएल जीव भरम
बंधन गांठ त पड़त गएल
पग-पग पर सब मिलत गएल
उतराए के चाह में देखीं
जीवन नईया डूबत गएल
मांगे मुक्ति के देव छाया
जग के इहे त रीत रहल
मुक्ति के ओर सब जनम-करम
रवि मिश्रा ( 26.06.2013)

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