देश में धर्मनिरपेक्षता को लेकर इस समय
अद्भुत चर्चा चल रही है.खेमे बने हुए हैं.धर्मनिरपेक्ष ताकतें और गैर–धर्मनिरपेक्ष ताकतें.और मजे की बात ये कि इनको मान्यता देने के लिए भी बड़े
अजीब पैमाने हैं.बहस जितनी छिछली है मसला उतना ही गंभीर.कम पढ़े लिखे लोग ही नहीं बल्कि पढ़ा-लिखा एक तबका भी कई पहलुओं से अंजान है
.लेकिन इस बहस में अपने तर्कों के साथ कुश्ती कर रहा है.सबसे बड़ा सवाल है ये है
कि क्या किसी राष्ट्र की कल्पना बिना धर्म के हो सकती है? क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां किसी धर्म को मानने
वाला कोई समाज न हो ? सवाल तो धर्म की परिभाषा को लेकर भी
है.और जब कोई राष्ट्र , या व्यक्ति या समुदाय खुद को धर्म-निरपेक्ष कहता है या
होने का दावा करता है तो असल में क्या वो ईश्वर विरोधी है या नास्तिक या सभी
धर्मों को मानता है ? क्या धर्म का प्रयोग राष्ट्र निर्माण में
नहीं हुआ या नहीं होता ? और धर्म की भूमि
भारत में धर्म की भूमिका राष्ट्र निर्माण में नहीं रही है ? अगर भारत में राष्ट्र की अवधारणा के साथ धर्म सतत रूप से
जुड़ा रहा है तो धर्मनिरपेक्ष शब्द यहां के लोगों के लिए नया और अस्पष्ट है ?
हिंदू एक धर्म से पहले समुदाय है ...वो
समुदाय जो सिंधु नदी के पास रहता था..हजारों साल पहले फारस के लोग ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ की तरह करते थे. बस
यहां से सिंधु की जगह हिंदू नाम का प्रचलन बढ़ा . भारत में रहने वाले वो लोग जो
यहां के सनातन धर्म को मानते थे वो हिंदू कहलाए.वैदिक युग में इस समुदाय की कई
शाखाएं निकली जो दर्शन की अलग –अलग धाराओं को
मानते थे. अचरज ये है कि वेदों से निकले उपनिषदों में पहली बार मौजूदा
धर्म की कमिओं की आलोचना दिखी ..नई विचारधारा का जन्म होना शुरू हुआ....जिसका चरम
हमने बौद्ध और जैन धर्म के रूप में देखा...ये और बात है कि इन धर्मों का भी बंटवारा
होगा गया ..और इसकी भी कई धाराएं निकल गयीं...इन घटनाओं के समानांतर चाणक्य के काल
में जब सिकंदर का आक्रमण हुआ तब चाण्क्य ने राष्ट्र की रक्षा का बीड़ा चंद्रगुप्त
के साथ उठाया.निचली जाति के धनानंद को गद्दी से बेदखल कर चंद्गुप्त को गद्दी पर
बिठाया. तब राजनीति में राष्ट्र बड़ा विषय था जाति नहीं .कौटिल्य शास्त्र में
उन्होने राष्ट्र की अवधारणा दी.,,आपको यकीन ही होगा की आज के मुकाबले कहीं बेहतर
प्रशासनिक व्यवस्था चाणक्य ने दी जिसकी वजह से एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण हुआ...हिंदू
राजा होने के बावजूद प्रशासन का स्वरूप धार्मिक नहीं था....बल्कि व्यवहारिक
था...दक्षिण से लेकर अफगानिस्तान की सीमाओं तक भारत एक हिंदू राष्ट्र ही
था...ब्राह्मण पुत्र चाणक्य का शिष्य चंद्रगुप्त जो शुरू में हिंदू था..उसने
दक्षिण भारत में एक जैन के रूप में अंतिम सांसें लीं.....चंद्रगुप्त का बेटा
बिंदुसार हिंदू रहा ..लेकिन बिंदुसार का पुत्र महान सम्राट अशोक पहले हिंदू फिर
बौद्ध हुआ. दादा ने देश को एक हिंदु राष्ट्र के रूप में जोड़ा तो पोते अशोक ने
राजनीतिक सीमाओं का विस्तार बौद्ध धर्म के सहारे किया .जो श्रीलंका तक पहुंच गया
.उधर दक्षिण में सनातन धर्म वैष्णव और शैव दो कट्टर समुदायों में बंट गया ...और इस
नाम पर जिस तरीके का राजनीति ध्रुवीकरण हुआ ...वो सारी हदें पार कर गया ..
सवाल ये है कि धर्म का जो राजनीति और
सामाजिक पहलू है ....वो राष्ट्र की संकल्पना के साथ ऐसा जुड़ा रहा है जिसे अबतक
अलग नहीं किया जा सका है ..क्योंकि राजनीति में इसकी उपयोगिता कभी समाप्त ही नहीं
हुई ...
जब महमूद ग़जनवी ने भारत पर आक्रमण किया
तो उसका मकसद इस्लाम का विस्तार नहीं बल्कि भारत को लूटने का था...लेकिन इस अभियान
को भी उसने जेहाद का नारा दिया ...उसने कभी भारत में सत्ता स्थापित नहीं की ..वरन
लूट के माल से गजनी प्रांत में अपनी सेना मजबूत की ...इस काम में गोरी ने थोड़ी
बहुत पहल की ..और उसके सिपहसालार कुतुबद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्लतनत की नींव रखी...लेकिन ये कोई राष्ट्र जैसी संकल्पना नहीं
थी....क्योंकि तबतक सभी धर्म और उसकी अनंत धाराओं ने क्षेत्रीय सीमाएं तय कर दीं
थी...और वो अपने-अपने दायरे में बंधे रहे और एक दूसरे से लड़ते रहे. इसके बाद की
एक बड़ी घटना बाबर से जुड़ी हुई है .खानवा कि लड़ाई के पहले बाबर ने अपनी सेना को
एकजुट करने के लिए सबके सामने शराब के प्याले तोड़े और एक सच्चा मुसलमान होने का
सबूत देने की कोशिश की .मकसद सत्ता हासिल करना था पर आधार धर्म बना क्योंकि इसके
बूते वो मुस्लिम सरदारों को एकजुट कर मजबूत राणा सांगा की सेना को हरा पाया .पर
धर्म का प्रयोग आधुनिक धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना के तर्ज पर बेहतरीन उपयोग अकबर
ने किया ..दीने इलाही धर्म की शुरूआत के पीछे भी यही मकसद था कि सभी धर्मों के लोग
उसे अपना राजा मान लें और मुगल सल्तनत में स्थिरता बनी रहे...ऐसा नहीं था कि जहां राजनीतिक विरोध हुआ वहां केवल
धर्म के आधार पर अकबर ने फैसले लिए....राजपूतों से पारिवारिक संबंध भी बनाए तो
राजपूतों का दमन भी किया ...अकबर से कुछ पहले सूफी धारा भी चली .बाद में हिंदू धर्म को
वैचारिक स्तर पर जोड़ने वाले तुलसी दास भी हुए ..और नानक साहब ने सिख धर्म शुरू
किया ..जिसने बाद में चल कर पंजाब में राजनीतक रंग ले लिया और राजा रंजीत सिंह के
चरम पर आकर रुका. अजीब है कि जिस सिख धर्म की स्थापना शांति और सभी धर्मों को
सम्मान देने के लिए हुआ..वो आखिर शुद्ध राजनीतिक और लड़ाकू समुदाय में तब्दील हो
गया ...इसके समानांतर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के साथ मराठों ने भी अपनी राजनीतिक
सीमाओं का जबदस्त विस्तार किया ...जो अंग्रेजों के समय तक मजबूत रहा ..
पश्चिम से आए
यूरोपीय लोगों जिनमें अग्रेज, पुर्तगाली, स्पैनिश, डच जैसे लोग थे वो भी धर्म की अहमीयत
समझते थे ..धर्म का सहारा लेते हुए उस दौरान भारत में तेजी से मिशनरियों की
स्थापना हुई..ये बात भी महत्वपूर्ण है कि भारत के पिछड़े इलाकों में मिशनरीज ने
अच्छा काम भी किया ...बाद में अग्रेंजो ने धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल की की
परिपाटी शुरू की ..1857 की क्रांति ने उन्हे सजग कर दिया ....रेजिमेंट का निमार्ण
धर्म और क्षेत्र के आधार पर किया ..मुसलमानों के लिए आरक्षण के मुद्दे को भुनाना
शुरू किया .1909 के मार्ले मिंटो सुधार के नाम पर वो खुल कर मैदान में आ गए ....जिसका
चरम भारत विभाजन के दौरान देखने को मिला ..जब धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ
..तो दूसरी ओर पाकिस्तान का गठन...ये फॉर्मूला इतना मजबूत रहा कि बाद के राजनेता
भी इसे छोड़ नहीं पाए ..और आज भी हम राजनीतिक हितों के आधार पर धर्मनिरपेक्षता का
सर्टिफिकेट बंटते हुए देखते हैं.
वापस उस सवाल पर
आते है कि क्या धर्म और राष्ट्र दोनों पृथक संकल्पनाएं हैं ? धर्मनिरपेक्ष
जैसी संकल्पना जिसकी परिभाषा का साफ नहीं है ..और जो राष्ट्रीय कम राजनैतिक ज्यादा लगती
है वो अबतक जमीन पर उतर क्यों नहीं पाई ? और जब बात समुदाओं के राजनैतिक हितों
की है तो वो धर्म से जोड़कर क्यों देखे जाते हैं ? लड़ाई सस्ता और हितों की है .जिसे धर्म जामा
पहनाया जाता है .इतिहास में इतने सबूत है जिसकी चर्चा के लिए पन्ने कम पड़ जाएंगे.राष्ट्र
का विकास किसी धर्म या समुदाय से भी जुड़ा हो सकता है .शर्त ये है कि नेतृत्व कैसा
है ? एक कमजोर शासक कभी भी मजबूत राष्ट्र नहीं दे पाया है .अगर राष्ट्र अक्षुण
नहीं..उसी सीमाएं सुरक्षित नहीं..उसके लोग संपन्न नहीं...जनता अभाव और भ्रष्टाचार
से त्रस्त हो ...वहां धार्मिक या धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट कुछ नहीं कर सकता....धर्म
का वास्तविक पहलू आध्यात्मिक है जो कि व्यक्तिगत है.दूसरा पहलू जो दिखता है वो
सामाजिक और राजनीतिक है ...जिसका ईश्वर से नहीं सत्ता और संघठन से संबंध है ....धर्मनिरपेक्षता
भी धर्म के सापेक्ष खड़ी गई एक अस्पष्ट अवधारणा है ..सुविधा के हिसाब से इसकी
परिभाषा बदली जाती है ..जिसके बूते राजनीतिक हित साधने के लिए एक वर्ग विशेष तैयार
किया जाता है ...इस शब्द से परे समय समय पर भारत का समाज खुद को हमेशा बदलता और
सामंजस्य स्थापित करता रहा है .फिर चाहे राज और काल किसी का भी हो
रवि मिश्रा (25.062013)
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