Monday, December 1, 2014

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया



अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया
होलिया ना रहे रे उदास
बरस-बरस कोरा रही गइल अंगना
कब ले करीं हम आस

चउखट सूना रहे सूना रहे घरवा
अंखवा रहेला उदास
जाने कौन बेरा होई सुनहे हो राम जी
बानी हम अंचरा पसार

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया..

कोनो रंग चढ़े नाही, मन में जीवन में
कोनो गीत सरगम न ताल
जोने कब फगुआ सुनाई हमरो दुअरा
जाने कब बाजी कौनों झाल

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया...

बरस भईल अब काटे ला दलनवा
तहरा के खोजे दिन रात
अबकी न अईब त जाने कब अईब
केकरा से कहीं मन के बात

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया...

काहे कईल नोकरी बन परदेसिया
माई माटी दूनो से तू दूर
जाने कब सुनब तू इनके अरजिया
कब ले इ मन मजबूर

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया
होलिया ना रहे रे उदास
बरस-बरस कोरा रही गइल अंगना
कब ले करीं हम आस
                                                   -   रवि मिश्रा ( 01.12.2014)


Sunday, November 30, 2014

भोर भईल


भोर भईल अब जाग साथी
रात अन्हरिया भागल साथी

पहिला किरण से जग उजियारा
दूर कहीं छुप गएल अंधियारा
घोर निरासा भागल साथी
आस के लाली छा गएल साथी

भोर भईल अब....

लेके के हरि के नाम तू जाग
जीवन के ताल पर तू हो भाग
एगो नया दिन आ गएल साथी
जीवन दर्शन बुझा गएल साथी

भोर भईल अब....

रात के बाद उजाला ही होला
जग के गति कभो कहंवा रुकेला
कर्म में अपना लाग हो साथी
इहे धरम बा जान हो साथी

भोर भईल अब....

सुख जइसे अंतिम सच ना ह
दुख भी ओइसे ही अमर कहां ह
चक्र चलेला हर दम हो साथी
करत जा आपन करम हो साथी

भोर भईल अब....













Friday, November 28, 2014

भोजपुरी का ह...




भोजपुरी का  ह
परदेस में मजदूर के मन के आसा ह
जौन कान में घुलजाए उ बतासा ह
इ बस बोली ना आपन मन के भासा ह

भोजपुरी का ह
उमंग, उत्साह , जीवन के संचार ह
दिल के गंगा जुबान से बहे उ प्यार ह
आचार ह , विचार ह ,व्यवहार है, आपन संसार ह

भोजपुरी का ह
लड़काई में दुलार के नाम ह
ए संसार में आपन पहचान ह
आन ह, बान ह , सान ह

भोजपुरी का ह
आपन जड़ ह, जवार ह
एगो बंधन हमार तहार ह
पोखर,घाट, बगईचा, अंगना दुआर ह

भोजपुरी का ह
छठ ,दिवाली, ईद, मुहर्रम ह
हर बिदेसिया के मन के मरहम ह
दया, प्रेम ,भाईचारा मेहनत ,परिश्रम ह

भोजपुरी का ह
सरसों, मकई, मसूरिया ,धान ह
खेत में पसीना बहावे उ किसान ह
सबके पेट भरे ओकरा के एगो प्रणाम ह

भोजपुरी का ह
सतुआ-सतुई, अचार , खटमिट्ठी ह
दही ह , चिउड़ा ह , चोखा लिट्टी ह
हर निवाला में प्रेम बा उहे मिट्टी ह

भोजपुरी का ह
माई-बाबू जी के दुलार ह
जीवन में सुख के बयार ह
हमार अस्तित्व ह, हमार आधार ह

-    रवि मिश्रा (29.11.2014)




Tuesday, September 16, 2014

बोलो सारण कब जागोगे


इस धरा को जब
अपने पुत्रों से मान न होगा
जब किसी ह्रदय में
खुद का ही सम्मान न होगा
जब मरुध्वज के आदर्शो की
हर चौराहे चिता सजेगी
जब दानी दधिचि का भी
नित दिन नित पल अपमान ही होगा

बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे.

जब सड़कों का कीचड़ उठकर
जन के जाके मन में सड़ेगा
जब भ्रष्टाचारी कोई जानवर
हर गरीब की आंते पकड़ेगा
जब होने का हमको ही
कोई भान न होगा
इस भूमि की संतान हैं हम
इसका ही अभिमान न होगा


बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे.

जब आखिरी लौ भी बुझ जाएगी
जब काली रात हर सूरज खाएगी
सत्ता के आगे हर सिर झुक जाएगा
हक मांगने वाला कोई भी स्वर
यहां नहीं उठ पाएगा

बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे

तुम देखो चारो ओर जरा
कितनी लूटी गई है धरा
हक मारा है किसने तेरा
पहचान यहां है कौन लुटेरा
जब गंदे नालों का पानी
रगो में बनकर खून बहेगा
जब अंधी बस्ती बन जाएगी
ये नगरी अंधे लोगों की

बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे

                                              -  रवि मिश्रा उर्फ 'सारण कुमार'

Thursday, May 29, 2014

चलों मिलकर गांठें सुलझाएं


चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं
जिन पर न हुई बहस अबतक
वो मसले सरे-आम उठाएं
चलों मिलकर गांठें सुलझाएं


मेरी खताओं का हिसाब तुम लेना
अपने गुनाहों का जवाब तुम देना
उस दिन न हो दरम्यां हमारे कोई
खुल के कहना रखना साफगोई
जख्मों के पैबंद खुले तो खुले
अपने -अपने दर्द एक दूजे को दिखाएं
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं





ये बेवजह के फिक़रे, ये बिन वजह के ताने
कहां से आएं गली-मुहल्लों के बीच कौन जाने
कुछ देर तुम भी खामोश रह लेना
मुंह बंद, हों ताले मैं भी कुछ कहूं ना
और कहूं तो लफ्ज नहीं अमृत हो
सदियों की कोई आग पलकभर में बुझ जाए
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं


पीढ़ियों का गुनाह कब तक कोई ढोए
इसी मंजर पे आके कब तक कोई रोए
तुम एक कदम बढ़ा देना लकीरों से आगे
मैं फासले पीछे छोड़ दूंगा तुम्हारा साथ पाके
तलवे कांटों से घायल हों तो हों
अब एक दूसरे के जख्मों को सहलाएं
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं

                                                                        - रवि मिश्रा(29-05-14)





Wednesday, May 7, 2014

बात बनत जाई


लूट लेलख देखीं, खेत खलिहान
सूख गएल देखीं, मजदूर आ किसान
खून के रंग भी, बदल गईल साथी
बांट देलख सबके, देखीं जाती-पाती

केकरो त पेट एगो, ढोए ना ढोआए
केकरो से खा-खा के चलल भी ना जाए
बाप-माई पोसे ले जवान बेटा-बेटी
काम न मिलल इहां, कमाए नाहीं रोटी

पईसा के प्रेम से , दाम लागे उंचा
दहेज बिना इंहवा, मुड़ी होखे नीचाझ
झूठ-मूठ शान बा, झूठवे के नाम बा
सच बोल देब त, न जान के अमान बा

आज चल देख ल, गंउवा- जवार के
टूट रहल बा इहां, बंधन सब प्यार के
भूख बढ़ गईल जहां, दुख बढ़ गईल उहां
पानी कोई पूछी ना, जईब अब तू कहां


छोड़ का करब तू , केतना बदलब तू
हर कोसिस के हार भएल, कबले यूं चलब तू
ना त चल के पूछ ल, केकर इ दोस बा
के बा अपराधी, काहे इ रोस बा


बाहर ना देखके, अपना से पूछ ल
आपन बुराई से, पहिले तू जूझ ल
कबतक अंहरिया के , राह चलत जाई
तू बदल जईब, सब बात बनत जाई


               -    रवि मिश्रा (07.05.2014)झ











Monday, May 5, 2014

किराए के सपने


किराए की खिड़की...
किराए की नजर
और यहां किराए के नजारे
देखो ना
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद है
सपने मेरे तुम्हारे

सुबह से शाम तक
तुम भागती हो जैसे
कोई रेस जीत जानी है तुम्हें
और तुमको देख
अंधा बना रहता हूं
जैसे कोई भी चीज
कुछ भी
नजर नहीं आनी है मुझे
आंखो के अंदर खड़ी हैं इमारतें
यहां बिखरे सामान के सहारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे

 छांव के कुछ टुकड़े
धूप की कुछ जलन
हर महीन खरीदते है हम
और बारिश तो बस प्यासा छोड़ जाती है
क्योंकि भीगने की भी सीमाएं है यहां
होठ मुस्कुराते हैं जिस तरह से
समझता तो मैं भी हूं
कुछ गिले शिकवे तुम्हारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे


ऐसी सपनों की कॉलोनियां
बसती जा रही हैं शहर में
तेरी-मेरी हजारों कहानियां
बिखरी है नजर-नजर में
थकते हैं पांव रुकते नहीं
क्योंकि जिंदगी पर
सपनों की किस्तें बाकीं हैं
देख लेना मुड़के कारंवा कभी
मुरझाए चेहरे , थके हारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे
                    - रवि मिश्रा ( 05-05-2014)



Saturday, April 12, 2014

लौट आव तू

ए नादान पंछी
लौट आव तू..लौट आव तू...लौट आव तू

काहे दर दर भटके
काहे रुके कहीं ना
कबतक  दूर घर से
भटके मन बन पंथी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..
ए नादान पंछी
लौट आव तू..लौट आव तू...लौट आव तू

पाख के जोर बा जेतना ओतना
आसमान तोहरा मिल त जाई
पर माटी के बंधन कईसे
कईसे कोई बिसराई
ए नादान पंछी ..ए नादान पंछी
तोहरा बिन बा सबकुछ सूना
जईस मोह के रंथी
ए नादान पंछी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..


पेट के आग समान होएला
रोटी में ना कोई भेद होला
पर माई के हाथ के कवर
मुहं से कहां छूटे पाएला
ए नादान पंछी ..ए नादान पंछी
माई के थरिया से भोग लगा ल
आस के अंगना में बन जा बंसी
ए नादान पंछी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..


                                                                  - रवि मिश्रा( 12.04.12)







Saturday, April 5, 2014

तेरा-मेरा मजहब


वो काफिर हो गया ...किसी की परस्ती कर ली
इंसानों से मुहब्त की ....और खुदकुशी कर ली

खुदा से थी मुहब्बत ...सो इबादत छोड़ दी
सब में उसी को देखा ..और ये आदत छोड़ दी

मंदिरो. मस्जिदो में मेरा दर कहा.
जहां बसे  इंसान मेरा तो घर वहां

सुना है मजहबों की दीबारें उठाई जा रही हैें फिर से
मेरी दुनियां कुछ और गिर गई है आज मेरी नजर से

अब आंखो को सब झुकाए चल रहे हैं ...
खुदा को क्या दिखाएं चेहरा..
सो छुपाए चल रहे हैं

अभी मेरी सांसे कुछ देर और चलेंगी...
मेरी मौत की दुआ कुछ देर और कर लेना...
तुम्हे कोई अफसोस न रहे ...
कोई छुपा खंजर मुझे नजर कर देना

मेरा भी मजहब वही है जो तेरा है ...
मेरा  भी रब वही है जो तेरा है ..
कभी मेरी नजरों से देख लेना...
जिसे तो अपनी सुबह कहता है ...
वो भी तो मेरा ही सवेरा है

चलो कुछ यूं कर लें...
उसका नूर आंखो  में भर लें...
फिर गिरेंगी वो सब दीवारें
जो अब तक थीं दरम्यां...
मिटेंगी लकीरें न होंगे निशां...
नजरों का कोई फेर न रहे ..
चलो कुछ ऐसी नजर कर लें

उसी मोड़ पर मिलूंगा हर बार ...
मै कहीं जाता नहीं ...
जब भी अंधरो से डर लगे यही आना...
जमीर करते हैं मुझे ...
जो हो वही दिखाता हूं ...
झूठे रिश्ते मैं निभाता नहीं ..

Thursday, March 6, 2014

दिल की बात सुनो

दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

जब पांव कहीं पे रूकना चाहें
मन यादों से ने छूटना चाहे
औरों को जो लगे अंधेरा
और तुम ढ़ूढ़ों उसी जगह
बीता हुआ वही सवेरा
रूक जाऊं या क़दम बढ़ाऊ
खुद के लिए जीऊं
या फिर दुनियां के नियमों के लिए
सांस लूं और मर जांऊ

ये जाल न जब टूटे
दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

जो छोड़ गये राहों में
सूखी , अकेली ,काटती
इन रास्तों की बाहों में
मिलते है फिर भी लोग
कोई हथेली अपनी नहीं क्यों मिलती
के फिर से थाम थोड़ा और जी जाऊं

मन जो ये उलझन न बूझे
 दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

दिल का कोई कोना ख़ाली क्यों है
और उसे नहीं भरने की ज़िद भी
कोई और क्यों उस कमरे में जाये
कोई नई ताज़ी हवा न आये
सो खिड़कियां दरवाज़े सब
बंद किये हैं सालों से
और उसमें दिवारों को सजाया है
जवाब न मिलने वाले सवालों से

फिर जब कुछ सवाल जवाबों के लिए चीख़े
दिल की बात सुनों
जब राह नहीं सूझे

तुम चले जाना.....



तुम चले  जाना
कि जब शाम की आखिरी किरण
खुद को बिस्तर में छुपा ले
जब परिंदें अपने घोंसलों का रूख करें
कि जब गली के मोड़ पर हमराह विदा लें

तुम चले जाना
कि जब खिड़कियों से
लौ उचक कर झांकने लगे
दूर किसी झोपड़ी के चूल्हों का धुआं
रात का संदेशा बांचने लगे

तुम चले जाना
कि मै चाहता हूं ये रात
मेरी बनी रहे
क्योंकि दिन बड़ी मुश्किल से आता है यहां
तुम्हारे लिए उजाले हों
रौशनी हो, तुम रहों जहां

तुम चले जाना
कि अंधेरों से मेरा पुराना वास्ता है
ये मेरा है
तुम्हारे लिए नहीं ये कठिन रास्ता है

तुम चले जाना
कि मै तुमको गिरता नही देख पाउंगा
मेरा क्या है
इन काली राहों पर
गिरता रहा हूं, फिर से गिर जाउंगा

तुम चले जाना
कि इसके आगे दिन-रात की सरहदें हैं
कुछ लकीरे हैं
जो बांट देती है नजृर और नज़रिये को
तुम्हारी नज़रों में सूरज के नज़ारे हों
उजाले हों, खुशियां हों
जो हक़ीक़त बनते हैं
ऐसे सपने हज़ारों हों
इसलिए ...........
तुम चले जाना

-रवि मिश्रा

सोने दो



सुबह की पलकें खोले कौन
 हिंडोले में ना डोले कौन
पुतली को सोने दो
सपना है , सपना ही सही
होने दो, आज मुझे सोने दो

बड़े दिनों के बाद
ये लहरें चौखट तक आयीं हैं
कोई बदरी मेरे छत की
इस दूर देस में छाई है
खाली हैं, खाली ही सही
होने दो,
आज मुझे सोने दो

इक धान की बाली फूट गई
और मेरे तकीये पर बिखर गई
लाल लाल एक धूप सुबह की
अलसाई पलकों में उतरी
उतरी और निखर गई
और इंद्रधनुष का एक घेरा भी है
झूठा है, होने दो
आज मुझे सोने दो

पैरों में लगी फिर गीली मिट्टी
बीते कल से आई है चिठ्ठी
लिखा बहुत कुछ अक्षर-अक्षर
भरे लिफ़ाफे परियों के पर
नानी ने भेजे होंगे
वरना कौन करेगा
बड़े हुए हम बच्चों की फ़िकर
बातें हैं, होने दो
आज मुझे सोने दो

-रवि मिश्रा

Thursday, January 23, 2014

कुछ सपने .....जो टूटते नहीं



 कोई तो बात होगी
कुछ सपनों में
जो मिटते नहीं
जो टूटते नहीं
जिनको मैं नींद में भी
सोते हुए
या दिन में भी
खुली आंखों से...
देखा करता था
देखा करता हूं
कोई तो बात होगी
कुछ सपनों में
जिनको जीने के लिए
मैं हर रोज मरता हूं
गिरता हूं,उठता हूं
संभलता हूं,
फिर चल देता हूं
कोई तो बात होगी
कुछ सपनों में
जो मेरा पीछा नहीं छोड़ते
मैं छुड़ाना भी नहीं चाहता
हथेली में भींच के
बंद करना चाहता हूं
दूर जाना भी नहीं चाहता
मालूम नहीं सच होने पर
उनकी शक्ल क्या होती है
ऐसी होती है क्या, जैसी दिखती है
वैसी दिखती है क्या, जैसा देखता हूं
चलो देखते है उनके हकीकत बनने तक
आखिर कोई तो बात होगी
कुछ सपनों में......