Monday, May 5, 2014

किराए के सपने


किराए की खिड़की...
किराए की नजर
और यहां किराए के नजारे
देखो ना
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद है
सपने मेरे तुम्हारे

सुबह से शाम तक
तुम भागती हो जैसे
कोई रेस जीत जानी है तुम्हें
और तुमको देख
अंधा बना रहता हूं
जैसे कोई भी चीज
कुछ भी
नजर नहीं आनी है मुझे
आंखो के अंदर खड़ी हैं इमारतें
यहां बिखरे सामान के सहारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे

 छांव के कुछ टुकड़े
धूप की कुछ जलन
हर महीन खरीदते है हम
और बारिश तो बस प्यासा छोड़ जाती है
क्योंकि भीगने की भी सीमाएं है यहां
होठ मुस्कुराते हैं जिस तरह से
समझता तो मैं भी हूं
कुछ गिले शिकवे तुम्हारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे


ऐसी सपनों की कॉलोनियां
बसती जा रही हैं शहर में
तेरी-मेरी हजारों कहानियां
बिखरी है नजर-नजर में
थकते हैं पांव रुकते नहीं
क्योंकि जिंदगी पर
सपनों की किस्तें बाकीं हैं
देख लेना मुड़के कारंवा कभी
मुरझाए चेहरे , थके हारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे
                    - रवि मिश्रा ( 05-05-2014)



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