Thursday, May 29, 2014

चलों मिलकर गांठें सुलझाएं


चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं
जिन पर न हुई बहस अबतक
वो मसले सरे-आम उठाएं
चलों मिलकर गांठें सुलझाएं


मेरी खताओं का हिसाब तुम लेना
अपने गुनाहों का जवाब तुम देना
उस दिन न हो दरम्यां हमारे कोई
खुल के कहना रखना साफगोई
जख्मों के पैबंद खुले तो खुले
अपने -अपने दर्द एक दूजे को दिखाएं
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं





ये बेवजह के फिक़रे, ये बिन वजह के ताने
कहां से आएं गली-मुहल्लों के बीच कौन जाने
कुछ देर तुम भी खामोश रह लेना
मुंह बंद, हों ताले मैं भी कुछ कहूं ना
और कहूं तो लफ्ज नहीं अमृत हो
सदियों की कोई आग पलकभर में बुझ जाए
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं


पीढ़ियों का गुनाह कब तक कोई ढोए
इसी मंजर पे आके कब तक कोई रोए
तुम एक कदम बढ़ा देना लकीरों से आगे
मैं फासले पीछे छोड़ दूंगा तुम्हारा साथ पाके
तलवे कांटों से घायल हों तो हों
अब एक दूसरे के जख्मों को सहलाएं
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं

                                                                        - रवि मिश्रा(29-05-14)





No comments:

Post a Comment