सुबह की पलकें खोले कौन
हिंडोले में ना डोले कौन
पुतली को सोने दो
सपना है , सपना ही सही
होने दो, आज मुझे सोने दो
बड़े दिनों के बाद
ये लहरें चौखट तक आयीं हैं
कोई बदरी मेरे छत की
इस दूर देस में छाई है
खाली हैं, खाली ही सही
होने दो,
आज मुझे सोने दो
इक धान की बाली फूट गई
और मेरे तकीये पर बिखर गई
लाल लाल एक धूप सुबह की
अलसाई पलकों में उतरी
उतरी और निखर गई
और इंद्रधनुष का एक घेरा भी है
झूठा है, होने दो
आज मुझे सोने दो
पैरों में लगी फिर गीली मिट्टी
बीते कल से आई है चिठ्ठी
लिखा बहुत कुछ अक्षर-अक्षर
भरे लिफ़ाफे परियों के पर
नानी ने भेजे होंगे
वरना कौन करेगा
बड़े हुए हम बच्चों की फ़िकर
बातें हैं, होने दो
आज मुझे सोने दो
-रवि मिश्रा
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