Thursday, March 6, 2014

तुम चले जाना.....



तुम चले  जाना
कि जब शाम की आखिरी किरण
खुद को बिस्तर में छुपा ले
जब परिंदें अपने घोंसलों का रूख करें
कि जब गली के मोड़ पर हमराह विदा लें

तुम चले जाना
कि जब खिड़कियों से
लौ उचक कर झांकने लगे
दूर किसी झोपड़ी के चूल्हों का धुआं
रात का संदेशा बांचने लगे

तुम चले जाना
कि मै चाहता हूं ये रात
मेरी बनी रहे
क्योंकि दिन बड़ी मुश्किल से आता है यहां
तुम्हारे लिए उजाले हों
रौशनी हो, तुम रहों जहां

तुम चले जाना
कि अंधेरों से मेरा पुराना वास्ता है
ये मेरा है
तुम्हारे लिए नहीं ये कठिन रास्ता है

तुम चले जाना
कि मै तुमको गिरता नही देख पाउंगा
मेरा क्या है
इन काली राहों पर
गिरता रहा हूं, फिर से गिर जाउंगा

तुम चले जाना
कि इसके आगे दिन-रात की सरहदें हैं
कुछ लकीरे हैं
जो बांट देती है नजृर और नज़रिये को
तुम्हारी नज़रों में सूरज के नज़ारे हों
उजाले हों, खुशियां हों
जो हक़ीक़त बनते हैं
ऐसे सपने हज़ारों हों
इसलिए ...........
तुम चले जाना

-रवि मिश्रा

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