वो काफिर हो गया ...किसी की परस्ती कर ली
इंसानों से मुहब्त की ....और खुदकुशी कर ली
खुदा से थी मुहब्बत ...सो इबादत छोड़ दी
सब में उसी को देखा ..और ये आदत छोड़ दी
मंदिरो. मस्जिदो में मेरा दर कहा.
जहां बसे इंसान मेरा तो घर वहां
सुना है मजहबों की दीबारें उठाई जा रही हैें फिर से
मेरी दुनियां कुछ और गिर गई है आज मेरी नजर से
अब आंखो को सब झुकाए चल रहे हैं ...
खुदा को क्या दिखाएं चेहरा..
सो छुपाए चल रहे हैं
अभी मेरी सांसे कुछ देर और चलेंगी...
मेरी मौत की दुआ कुछ देर और कर लेना...
तुम्हे कोई अफसोस न रहे ...
कोई छुपा खंजर मुझे नजर कर देना
मेरा भी मजहब वही है जो तेरा है ...
मेरा भी रब वही है जो तेरा है ..
कभी मेरी नजरों से देख लेना...
जिसे तो अपनी सुबह कहता है ...
वो भी तो मेरा ही सवेरा है
चलो कुछ यूं कर लें...
उसका नूर आंखो में भर लें...
फिर गिरेंगी वो सब दीवारें
जो अब तक थीं दरम्यां...
मिटेंगी लकीरें न होंगे निशां...
नजरों का कोई फेर न रहे ..
चलो कुछ ऐसी नजर कर लें
उसी मोड़ पर मिलूंगा हर बार ...
मै कहीं जाता नहीं ...
जब भी अंधरो से डर लगे यही आना...
जमीर करते हैं मुझे ...
जो हो वही दिखाता हूं ...
झूठे रिश्ते मैं निभाता नहीं ..
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