Thursday, June 30, 2016

मैं गाँव देखता हूं


मिट्टी में सने अपने
मैं पांव देखता हूँ
यहां होती है बारिश
तो मैं गाँव देखता हूँ...

चल रहां हूँ बेसुध
हर पड़ाव देखता हूँ
जभी हुई है धूप तो
माँ सी छाँव देखता हूँ....

समंदरों के बीच मैं
अपनी नाव देखता हूँ
गिरते उठते मन के
कुछ घाव देखता हूँ...

बाज़ार में खड़ा हूँ
अपना भाव देखता हूँ
बाज़ी नहीं है मेरी
हर दांव देखता हूँ...

No comments:

Post a Comment