क़तरा- क़तरा सब सूख गया
हर बादल ऐसे रूठ गया
वो गांव जो इतना प्यासा है
कुछ बूंदों की बस आशा है
पोखर का पानी मरने को है
वो बूढ़ा बरगद गिरने को है
धरती टक-टक देख रही
लेकिन मिटती ये प्यास नहीं
खाली खेत और ऊपर आग
कैसे फूटे अपने भाग
कंठ की प्यास बुझती नहीं
चलो चलें हम और कहीं
उनके गले जो तर हैं अब तक
सूखे कंठों की पीड़ा क्या जानें
कुछ मास प्यास के और हैं बाक़ी
अभी मौत की चलेगी झांकी
कोई देव हो ऊपर तो देखे
इस गांव पे टुकड़े कुछ तो फेंके
हर मौत पे जश्न मनाते हैं
वो रहनुमा यहां अब आते हैं
वादों की अर्थी पर लाशें
हर बार यहां सजती हैं
तमस घोर है कहां है दीप्त
ये गांव हमारा है अतृप्त
- रवि मिश्रा

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