Thursday, June 30, 2016

छत का चांद

एक और सपना देख लूं
रात की इस चादर से
गुजरता एक चांद रोक लूँ

बादलों का हाल कैसा है देस में
यहां कैसे आए तुम परदेस में
क्या अब भी छतों पर तारे उतरते हैं
क्या झींगुर अब भी वैसा शोर करते हैं
रोका था अबतक वो सवाल पूछ लूं
बैठो न तुम्हारा हाल पूछ लूं

रोक लेता जो रोक पाता
चल देता जो मैं चल पाता
आता जाता बहुत हूँ मैं
पहुंचता नहीं मगर कहीं
मैं अपने मकान से निकल लूं
कहो तो आज अपने घर चल लूं

क्या छोड़ दूं क्या समेट लूं
मन से किन यादों को लपेट लूं
तुम चलो मैं आता हूँ फिर
मैं बाकी के कुछ काम कर लूँ
कल जिंदा रहने को आज मर लूँ

तुम चमकते रहना मेरी छत पर
नजर नहीं आते,  नजर में हो मगर
कभी लौटा तो मिलेंगे हम
करेंगे बीच की छूटी हुई बातें
अभी इंतजार है, मैं इंतजार कर लूँ
मैं अपने सपने को और प्यार कर लूँ
--------######--------------

No comments:

Post a Comment