Saturday, June 22, 2013

एक भूखंड





निर्जन, एकांत, अनछुआ
एक भूखंड छोड़ देना

जहां दूभ के तिनके
अपनी तरुणाई को जीते रहें
सदियों तक
जहां खग के झुंड
कलरव करें यहां -वहां
वादियों तक
वन के ऐसे जीवन को
जीवंत छोड़ देना
एक भूखंड छोड़ देना
 नदियां रहें
अविरल, निर्मल
जीव-जंतु बसे
जंगल जंगल
कंदराओं घोंसलों में लौट जाना हो
ऐसी गाढ़ी श्यामल
निशा हो
भोर का सूरज हर पलक खोल दे
उजालों में सनी
हर दिशा हो
तय मास में जो आए
वो वसंत छोड़ देना
एक भूखंड छोड़ देना


हिम की दुशाला ओढ़े
शैल शिखाएं
मरू का भी हो विस्तार
न हो सीमाएं
मानव पग ना पड़े हों
नैसर्गिक सा ही रहे
जीवन के आधार जहां
प्रकृति से जुड़े हों
धरा का एक ऐसा रूप
एक ऐसा ही रंग छोड़ देना

निर्जन, एकांत, अनछुआ
एक भूखंड छोड़ देना

-          रवि मिश्रा
23.06.2013










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