मैं उस तन नाहीं
जो बस नार सरीखा लागेउस नदिया का रूप नहीं
जो बस धार सरीखा लागे
पंखुड़ से भी कोमल हूं
और पावक पथ पर न जलूं जरा सा
अंबर से भी विशाल है आंचल
आंचल में प्रेम, ममता, निर्मलता
निर्भय, निष्ठा, दया, सजलता
कर्मकांड, सस्कार सभी
हर काल, समय मुझसे ही पूरा
न होऊं, तो जग है अधूरा
पुलकित, कंचन, संरक्षित, पल्लवित
देह के रूप नहीं मेरे हैं
ये तो नारी का है मन
जो काया की सीमा से आगे
नारी का मन मेरा
जो माया की सीमा से आगे
तन से ज्यादा वही मन है
और ये मन हर ह्दय में बसता
जिसने पाया वही जीवन है.
- रवि मिश्रा

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