Wednesday, May 7, 2014

बात बनत जाई


लूट लेलख देखीं, खेत खलिहान
सूख गएल देखीं, मजदूर आ किसान
खून के रंग भी, बदल गईल साथी
बांट देलख सबके, देखीं जाती-पाती

केकरो त पेट एगो, ढोए ना ढोआए
केकरो से खा-खा के चलल भी ना जाए
बाप-माई पोसे ले जवान बेटा-बेटी
काम न मिलल इहां, कमाए नाहीं रोटी

पईसा के प्रेम से , दाम लागे उंचा
दहेज बिना इंहवा, मुड़ी होखे नीचाझ
झूठ-मूठ शान बा, झूठवे के नाम बा
सच बोल देब त, न जान के अमान बा

आज चल देख ल, गंउवा- जवार के
टूट रहल बा इहां, बंधन सब प्यार के
भूख बढ़ गईल जहां, दुख बढ़ गईल उहां
पानी कोई पूछी ना, जईब अब तू कहां


छोड़ का करब तू , केतना बदलब तू
हर कोसिस के हार भएल, कबले यूं चलब तू
ना त चल के पूछ ल, केकर इ दोस बा
के बा अपराधी, काहे इ रोस बा


बाहर ना देखके, अपना से पूछ ल
आपन बुराई से, पहिले तू जूझ ल
कबतक अंहरिया के , राह चलत जाई
तू बदल जईब, सब बात बनत जाई


               -    रवि मिश्रा (07.05.2014)झ











Monday, May 5, 2014

किराए के सपने


किराए की खिड़की...
किराए की नजर
और यहां किराए के नजारे
देखो ना
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद है
सपने मेरे तुम्हारे

सुबह से शाम तक
तुम भागती हो जैसे
कोई रेस जीत जानी है तुम्हें
और तुमको देख
अंधा बना रहता हूं
जैसे कोई भी चीज
कुछ भी
नजर नहीं आनी है मुझे
आंखो के अंदर खड़ी हैं इमारतें
यहां बिखरे सामान के सहारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे

 छांव के कुछ टुकड़े
धूप की कुछ जलन
हर महीन खरीदते है हम
और बारिश तो बस प्यासा छोड़ जाती है
क्योंकि भीगने की भी सीमाएं है यहां
होठ मुस्कुराते हैं जिस तरह से
समझता तो मैं भी हूं
कुछ गिले शिकवे तुम्हारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे


ऐसी सपनों की कॉलोनियां
बसती जा रही हैं शहर में
तेरी-मेरी हजारों कहानियां
बिखरी है नजर-नजर में
थकते हैं पांव रुकते नहीं
क्योंकि जिंदगी पर
सपनों की किस्तें बाकीं हैं
देख लेना मुड़के कारंवा कभी
मुरझाए चेहरे , थके हारे
ईंट-पत्थर की दीवारों में कैद हैं
सपने, मेरे तुम्हारे
                    - रवि मिश्रा ( 05-05-2014)



Saturday, April 12, 2014

लौट आव तू

ए नादान पंछी
लौट आव तू..लौट आव तू...लौट आव तू

काहे दर दर भटके
काहे रुके कहीं ना
कबतक  दूर घर से
भटके मन बन पंथी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..
ए नादान पंछी
लौट आव तू..लौट आव तू...लौट आव तू

पाख के जोर बा जेतना ओतना
आसमान तोहरा मिल त जाई
पर माटी के बंधन कईसे
कईसे कोई बिसराई
ए नादान पंछी ..ए नादान पंछी
तोहरा बिन बा सबकुछ सूना
जईस मोह के रंथी
ए नादान पंछी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..


पेट के आग समान होएला
रोटी में ना कोई भेद होला
पर माई के हाथ के कवर
मुहं से कहां छूटे पाएला
ए नादान पंछी ..ए नादान पंछी
माई के थरिया से भोग लगा ल
आस के अंगना में बन जा बंसी
ए नादान पंछी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..


                                                                  - रवि मिश्रा( 12.04.12)







Saturday, April 5, 2014

तेरा-मेरा मजहब


वो काफिर हो गया ...किसी की परस्ती कर ली
इंसानों से मुहब्त की ....और खुदकुशी कर ली

खुदा से थी मुहब्बत ...सो इबादत छोड़ दी
सब में उसी को देखा ..और ये आदत छोड़ दी

मंदिरो. मस्जिदो में मेरा दर कहा.
जहां बसे  इंसान मेरा तो घर वहां

सुना है मजहबों की दीबारें उठाई जा रही हैें फिर से
मेरी दुनियां कुछ और गिर गई है आज मेरी नजर से

अब आंखो को सब झुकाए चल रहे हैं ...
खुदा को क्या दिखाएं चेहरा..
सो छुपाए चल रहे हैं

अभी मेरी सांसे कुछ देर और चलेंगी...
मेरी मौत की दुआ कुछ देर और कर लेना...
तुम्हे कोई अफसोस न रहे ...
कोई छुपा खंजर मुझे नजर कर देना

मेरा भी मजहब वही है जो तेरा है ...
मेरा  भी रब वही है जो तेरा है ..
कभी मेरी नजरों से देख लेना...
जिसे तो अपनी सुबह कहता है ...
वो भी तो मेरा ही सवेरा है

चलो कुछ यूं कर लें...
उसका नूर आंखो  में भर लें...
फिर गिरेंगी वो सब दीवारें
जो अब तक थीं दरम्यां...
मिटेंगी लकीरें न होंगे निशां...
नजरों का कोई फेर न रहे ..
चलो कुछ ऐसी नजर कर लें

उसी मोड़ पर मिलूंगा हर बार ...
मै कहीं जाता नहीं ...
जब भी अंधरो से डर लगे यही आना...
जमीर करते हैं मुझे ...
जो हो वही दिखाता हूं ...
झूठे रिश्ते मैं निभाता नहीं ..

Thursday, March 6, 2014

दिल की बात सुनो

दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

जब पांव कहीं पे रूकना चाहें
मन यादों से ने छूटना चाहे
औरों को जो लगे अंधेरा
और तुम ढ़ूढ़ों उसी जगह
बीता हुआ वही सवेरा
रूक जाऊं या क़दम बढ़ाऊ
खुद के लिए जीऊं
या फिर दुनियां के नियमों के लिए
सांस लूं और मर जांऊ

ये जाल न जब टूटे
दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

जो छोड़ गये राहों में
सूखी , अकेली ,काटती
इन रास्तों की बाहों में
मिलते है फिर भी लोग
कोई हथेली अपनी नहीं क्यों मिलती
के फिर से थाम थोड़ा और जी जाऊं

मन जो ये उलझन न बूझे
 दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

दिल का कोई कोना ख़ाली क्यों है
और उसे नहीं भरने की ज़िद भी
कोई और क्यों उस कमरे में जाये
कोई नई ताज़ी हवा न आये
सो खिड़कियां दरवाज़े सब
बंद किये हैं सालों से
और उसमें दिवारों को सजाया है
जवाब न मिलने वाले सवालों से

फिर जब कुछ सवाल जवाबों के लिए चीख़े
दिल की बात सुनों
जब राह नहीं सूझे

तुम चले जाना.....



तुम चले  जाना
कि जब शाम की आखिरी किरण
खुद को बिस्तर में छुपा ले
जब परिंदें अपने घोंसलों का रूख करें
कि जब गली के मोड़ पर हमराह विदा लें

तुम चले जाना
कि जब खिड़कियों से
लौ उचक कर झांकने लगे
दूर किसी झोपड़ी के चूल्हों का धुआं
रात का संदेशा बांचने लगे

तुम चले जाना
कि मै चाहता हूं ये रात
मेरी बनी रहे
क्योंकि दिन बड़ी मुश्किल से आता है यहां
तुम्हारे लिए उजाले हों
रौशनी हो, तुम रहों जहां

तुम चले जाना
कि अंधेरों से मेरा पुराना वास्ता है
ये मेरा है
तुम्हारे लिए नहीं ये कठिन रास्ता है

तुम चले जाना
कि मै तुमको गिरता नही देख पाउंगा
मेरा क्या है
इन काली राहों पर
गिरता रहा हूं, फिर से गिर जाउंगा

तुम चले जाना
कि इसके आगे दिन-रात की सरहदें हैं
कुछ लकीरे हैं
जो बांट देती है नजृर और नज़रिये को
तुम्हारी नज़रों में सूरज के नज़ारे हों
उजाले हों, खुशियां हों
जो हक़ीक़त बनते हैं
ऐसे सपने हज़ारों हों
इसलिए ...........
तुम चले जाना

-रवि मिश्रा

सोने दो



सुबह की पलकें खोले कौन
 हिंडोले में ना डोले कौन
पुतली को सोने दो
सपना है , सपना ही सही
होने दो, आज मुझे सोने दो

बड़े दिनों के बाद
ये लहरें चौखट तक आयीं हैं
कोई बदरी मेरे छत की
इस दूर देस में छाई है
खाली हैं, खाली ही सही
होने दो,
आज मुझे सोने दो

इक धान की बाली फूट गई
और मेरे तकीये पर बिखर गई
लाल लाल एक धूप सुबह की
अलसाई पलकों में उतरी
उतरी और निखर गई
और इंद्रधनुष का एक घेरा भी है
झूठा है, होने दो
आज मुझे सोने दो

पैरों में लगी फिर गीली मिट्टी
बीते कल से आई है चिठ्ठी
लिखा बहुत कुछ अक्षर-अक्षर
भरे लिफ़ाफे परियों के पर
नानी ने भेजे होंगे
वरना कौन करेगा
बड़े हुए हम बच्चों की फ़िकर
बातें हैं, होने दो
आज मुझे सोने दो

-रवि मिश्रा