Thursday, June 30, 2016

द कप

स्वामी विवेकानंद की रचित अंग्रेजी की मेरी एक और प्रिय कविता "द कप"...आध्यात्म से जुडी हुई... जिसका हिंदी अनुवाद करने का मैने एक छोटा सा प्यारा किया है...जरूर पढे... बहुत गहराई है

"द कप"

ये प्याला
तुम्हारा है
तुम्हें मिला है
तुमको ही
आरंभ से

ना! नहीं मेरे तनुज
मालूम है मुझे
ये कड़वा प्याला
ये प्याला तुम्हारा
 अपना है इसमें
 वर्षों से तुमने
तृष्णा, त्रुटियां
भरी हैं जिसमें

ये तकलीफदेह
और नीरस पथ
ये पथ तुम्हारा है
मैंने ही रखी हैं शिलाएं
और नहीं जिसपर
पलभर आराम ज़रा है
तुम्हारे सहचर का मार्ग
सरल है सुगम है
उसका भी मुझतक
तुम सा ही आगमन है
पर हे! तनुज
तुम्हे चलना है
इसी कठिन पथ पर
तुमको ही जलना है

ये तुम्हारा कर्म है
न कोई गौरव है
न आनंद है
पर किसी और का नहीं
ये तो निश्चय है
और मेरी दुनिया में
स्थान सभी के तय हैं
स्वीकार करो
बुद्धि से समझ न पाओगे
आँखें बंद करो और
मुझको तुम यूं पाओगे
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This is your cup -- the cup assigned
to you from the beginning.
Nay, My child, I know how much
of that dark drink is your own brew
Of fault and passion, ages long ago,
In the deep years of yesterday, I know.

This is your road -- a painful road and drear.
I made the stones that never give you rest.
I set your friend in plesant ways and clear,
And he shall come like you, unto My breast.
But you, My child, must travel here.

This is your task. It has no joy nor grace,
But it is not meant for any other hand,
And in My universe hath measured place,
Take it. I do not bid you understand.
I bid you close your eyes to see My face.

- Swami Vivekananda

सुखी जीवन

एलेक्जेंडर पोप रचित अंग्रेजी की अपनी एक प्रिय कविता का हिंदी अनुवाद करने का प्रयास..पढिए मन को सुकून मिलेगा

एक शांत जीवन
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उसी का जीवन सुखी होता है
पूर्वजों की जमीन के किसी टुकड़े से
जो अपनी चाहत,जरूरत पूरी करता है
जो अपनी जमीन पर खड़ा रहता है
जन्म भूमि की हवा सीने में भरता है
अपनी गाय का दूध हो
अपने खेत की रोटी हो
अपने कपास की धोती हो
धूप में जिसके अपने पेड़ छाँव दें
और जाड़े में जलता अलाव दें

उसी का जीवन सुखी होता है
जिसे बेफिक्री का वरदान है
जिसके लिए घंटों, दिनों या सालों का
यूं हीं गुजरते रहना सरल, आसान है
निरोगी काया, मन शांत हो
रातों की नींद गहरी एकांत हो
फुर्सत से कुछ पढ़ सके
और प्यारा कुछ गढ़ सके
भोलापन ऐसा पाए
जिससे मिले उसे भाए

तो मुझे अनदेखा,  अंजाना रहने दो
बिना किसी शोक विलाप मरने दो
दुनिया से चुपचाप विदा कहने दो
दफना दो मगर कोई पत्थर न रखना
अब बताओ कि मुझे कहां है मरना
Arun Kumar Chaubey, Preeti Mishra, Tulika Tiwari, Anshika Singh, Shahnawaz Ahmad Ansari, Shivani Bhatt, Amitaabh Srivastava

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“The Quiet Life” by Alexander Pope

Happy the man whose wish and care

A few paternal acres bound

Content to breathe his native air

In his own ground.

Whose herd with milk, whose fields with

bread,

Whose flocks supply him with attire;

Whose trees in summer yield him shade,

In winter, fire.

Blest, who can unconcern’dly find

Hours, days, and years, slide soft away

In health of body; peace of mind;

Quiet by day;

Sound sleep by night; study and ease

Together mix’d; sweet recreation,

And innocence, which most does please

With meditation.

Thus let me live, unseen, unknown;

Thus unlamented let me die;

Steal from the world, and not a stone

Tell where I lie.

छत का चांद

एक और सपना देख लूं
रात की इस चादर से
गुजरता एक चांद रोक लूँ

बादलों का हाल कैसा है देस में
यहां कैसे आए तुम परदेस में
क्या अब भी छतों पर तारे उतरते हैं
क्या झींगुर अब भी वैसा शोर करते हैं
रोका था अबतक वो सवाल पूछ लूं
बैठो न तुम्हारा हाल पूछ लूं

रोक लेता जो रोक पाता
चल देता जो मैं चल पाता
आता जाता बहुत हूँ मैं
पहुंचता नहीं मगर कहीं
मैं अपने मकान से निकल लूं
कहो तो आज अपने घर चल लूं

क्या छोड़ दूं क्या समेट लूं
मन से किन यादों को लपेट लूं
तुम चलो मैं आता हूँ फिर
मैं बाकी के कुछ काम कर लूँ
कल जिंदा रहने को आज मर लूँ

तुम चमकते रहना मेरी छत पर
नजर नहीं आते,  नजर में हो मगर
कभी लौटा तो मिलेंगे हम
करेंगे बीच की छूटी हुई बातें
अभी इंतजार है, मैं इंतजार कर लूँ
मैं अपने सपने को और प्यार कर लूँ
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कश्मीर उसका घर है

है मगर आता नहीं नजर है
सुना है कश्मीर उसका घर है

कहां हैं वो दीवारें
वो खिड़कियां
चिनारों पर अब
ये किसका असर है
सुना है कश्मीर उसका घर है

आँखों में झेलम -चिनाब भरा है
बहता है कई बार
छूटे पहाड़ जो माली थे
सूरज तो है कहां सहर है
सुना है कश्मीर उसका घर है

है कोई खुदा तो
है कोई रहनुमा तो
कोई निजाम यहां अगर है
वो पूछती है उनसे
अरसा हुआ रोते
क्या आंसुओं में बाकी कोई असर है
सुना है कश्मीर उसका घर है

हर बार जो लौटती है
मिट्टी की खुशबू ओढ़ती है
छूटे खेल खिलौने कहां हैं
अपने घर के वो कोने कहां हैं
आँखों मे रहता मकान सा है
वो कोई छूटा आसमान सा है
वो आसमान उसका किधर है
सुना है कश्मीर उसका घर है
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मैं गाँव देखता हूं


मिट्टी में सने अपने
मैं पांव देखता हूँ
यहां होती है बारिश
तो मैं गाँव देखता हूँ...

चल रहां हूँ बेसुध
हर पड़ाव देखता हूँ
जभी हुई है धूप तो
माँ सी छाँव देखता हूँ....

समंदरों के बीच मैं
अपनी नाव देखता हूँ
गिरते उठते मन के
कुछ घाव देखता हूँ...

बाज़ार में खड़ा हूँ
अपना भाव देखता हूँ
बाज़ी नहीं है मेरी
हर दांव देखता हूँ...