Saturday, April 12, 2014

लौट आव तू

ए नादान पंछी
लौट आव तू..लौट आव तू...लौट आव तू

काहे दर दर भटके
काहे रुके कहीं ना
कबतक  दूर घर से
भटके मन बन पंथी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..
ए नादान पंछी
लौट आव तू..लौट आव तू...लौट आव तू

पाख के जोर बा जेतना ओतना
आसमान तोहरा मिल त जाई
पर माटी के बंधन कईसे
कईसे कोई बिसराई
ए नादान पंछी ..ए नादान पंछी
तोहरा बिन बा सबकुछ सूना
जईस मोह के रंथी
ए नादान पंछी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..


पेट के आग समान होएला
रोटी में ना कोई भेद होला
पर माई के हाथ के कवर
मुहं से कहां छूटे पाएला
ए नादान पंछी ..ए नादान पंछी
माई के थरिया से भोग लगा ल
आस के अंगना में बन जा बंसी
ए नादान पंछी
लौट आव तू...लौट आव तू ...लौट आव तू..


                                                                  - रवि मिश्रा( 12.04.12)







Saturday, April 5, 2014

तेरा-मेरा मजहब


वो काफिर हो गया ...किसी की परस्ती कर ली
इंसानों से मुहब्त की ....और खुदकुशी कर ली

खुदा से थी मुहब्बत ...सो इबादत छोड़ दी
सब में उसी को देखा ..और ये आदत छोड़ दी

मंदिरो. मस्जिदो में मेरा दर कहा.
जहां बसे  इंसान मेरा तो घर वहां

सुना है मजहबों की दीबारें उठाई जा रही हैें फिर से
मेरी दुनियां कुछ और गिर गई है आज मेरी नजर से

अब आंखो को सब झुकाए चल रहे हैं ...
खुदा को क्या दिखाएं चेहरा..
सो छुपाए चल रहे हैं

अभी मेरी सांसे कुछ देर और चलेंगी...
मेरी मौत की दुआ कुछ देर और कर लेना...
तुम्हे कोई अफसोस न रहे ...
कोई छुपा खंजर मुझे नजर कर देना

मेरा भी मजहब वही है जो तेरा है ...
मेरा  भी रब वही है जो तेरा है ..
कभी मेरी नजरों से देख लेना...
जिसे तो अपनी सुबह कहता है ...
वो भी तो मेरा ही सवेरा है

चलो कुछ यूं कर लें...
उसका नूर आंखो  में भर लें...
फिर गिरेंगी वो सब दीवारें
जो अब तक थीं दरम्यां...
मिटेंगी लकीरें न होंगे निशां...
नजरों का कोई फेर न रहे ..
चलो कुछ ऐसी नजर कर लें

उसी मोड़ पर मिलूंगा हर बार ...
मै कहीं जाता नहीं ...
जब भी अंधरो से डर लगे यही आना...
जमीर करते हैं मुझे ...
जो हो वही दिखाता हूं ...
झूठे रिश्ते मैं निभाता नहीं ..

Thursday, March 6, 2014

दिल की बात सुनो

दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

जब पांव कहीं पे रूकना चाहें
मन यादों से ने छूटना चाहे
औरों को जो लगे अंधेरा
और तुम ढ़ूढ़ों उसी जगह
बीता हुआ वही सवेरा
रूक जाऊं या क़दम बढ़ाऊ
खुद के लिए जीऊं
या फिर दुनियां के नियमों के लिए
सांस लूं और मर जांऊ

ये जाल न जब टूटे
दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

जो छोड़ गये राहों में
सूखी , अकेली ,काटती
इन रास्तों की बाहों में
मिलते है फिर भी लोग
कोई हथेली अपनी नहीं क्यों मिलती
के फिर से थाम थोड़ा और जी जाऊं

मन जो ये उलझन न बूझे
 दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

दिल का कोई कोना ख़ाली क्यों है
और उसे नहीं भरने की ज़िद भी
कोई और क्यों उस कमरे में जाये
कोई नई ताज़ी हवा न आये
सो खिड़कियां दरवाज़े सब
बंद किये हैं सालों से
और उसमें दिवारों को सजाया है
जवाब न मिलने वाले सवालों से

फिर जब कुछ सवाल जवाबों के लिए चीख़े
दिल की बात सुनों
जब राह नहीं सूझे

तुम चले जाना.....



तुम चले  जाना
कि जब शाम की आखिरी किरण
खुद को बिस्तर में छुपा ले
जब परिंदें अपने घोंसलों का रूख करें
कि जब गली के मोड़ पर हमराह विदा लें

तुम चले जाना
कि जब खिड़कियों से
लौ उचक कर झांकने लगे
दूर किसी झोपड़ी के चूल्हों का धुआं
रात का संदेशा बांचने लगे

तुम चले जाना
कि मै चाहता हूं ये रात
मेरी बनी रहे
क्योंकि दिन बड़ी मुश्किल से आता है यहां
तुम्हारे लिए उजाले हों
रौशनी हो, तुम रहों जहां

तुम चले जाना
कि अंधेरों से मेरा पुराना वास्ता है
ये मेरा है
तुम्हारे लिए नहीं ये कठिन रास्ता है

तुम चले जाना
कि मै तुमको गिरता नही देख पाउंगा
मेरा क्या है
इन काली राहों पर
गिरता रहा हूं, फिर से गिर जाउंगा

तुम चले जाना
कि इसके आगे दिन-रात की सरहदें हैं
कुछ लकीरे हैं
जो बांट देती है नजृर और नज़रिये को
तुम्हारी नज़रों में सूरज के नज़ारे हों
उजाले हों, खुशियां हों
जो हक़ीक़त बनते हैं
ऐसे सपने हज़ारों हों
इसलिए ...........
तुम चले जाना

-रवि मिश्रा

सोने दो



सुबह की पलकें खोले कौन
 हिंडोले में ना डोले कौन
पुतली को सोने दो
सपना है , सपना ही सही
होने दो, आज मुझे सोने दो

बड़े दिनों के बाद
ये लहरें चौखट तक आयीं हैं
कोई बदरी मेरे छत की
इस दूर देस में छाई है
खाली हैं, खाली ही सही
होने दो,
आज मुझे सोने दो

इक धान की बाली फूट गई
और मेरे तकीये पर बिखर गई
लाल लाल एक धूप सुबह की
अलसाई पलकों में उतरी
उतरी और निखर गई
और इंद्रधनुष का एक घेरा भी है
झूठा है, होने दो
आज मुझे सोने दो

पैरों में लगी फिर गीली मिट्टी
बीते कल से आई है चिठ्ठी
लिखा बहुत कुछ अक्षर-अक्षर
भरे लिफ़ाफे परियों के पर
नानी ने भेजे होंगे
वरना कौन करेगा
बड़े हुए हम बच्चों की फ़िकर
बातें हैं, होने दो
आज मुझे सोने दो

-रवि मिश्रा

Thursday, January 23, 2014

कुछ सपने .....जो टूटते नहीं



 कोई तो बात होगी
कुछ सपनों में
जो मिटते नहीं
जो टूटते नहीं
जिनको मैं नींद में भी
सोते हुए
या दिन में भी
खुली आंखों से...
देखा करता था
देखा करता हूं
कोई तो बात होगी
कुछ सपनों में
जिनको जीने के लिए
मैं हर रोज मरता हूं
गिरता हूं,उठता हूं
संभलता हूं,
फिर चल देता हूं
कोई तो बात होगी
कुछ सपनों में
जो मेरा पीछा नहीं छोड़ते
मैं छुड़ाना भी नहीं चाहता
हथेली में भींच के
बंद करना चाहता हूं
दूर जाना भी नहीं चाहता
मालूम नहीं सच होने पर
उनकी शक्ल क्या होती है
ऐसी होती है क्या, जैसी दिखती है
वैसी दिखती है क्या, जैसा देखता हूं
चलो देखते है उनके हकीकत बनने तक
आखिर कोई तो बात होगी
कुछ सपनों में......

Thursday, December 5, 2013

उम्मीदों का जनप्रतिनिधी

एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो
जो जन के जीवन से जुड़ा हो
जो वचनों से नहीं कर्म से पूरा हो
वो जो राष्ट्र के उत्थान की सोचे
वो जो बेघर के मकान की सोचे
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो...
 
ऐसा जो मुकरे नहीं वादों से
ऐसा जो अटल हो अपने हो इरादों से
जो  करे बात हमारी तुम्हारी
जिसे ने लगे भ्रष्टाचार की बीमारी
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो...
 
जो जुड़ा हो सच के जहान से
जिसकी सोच मिलती हो तरक्की के आसमान से
जिसके हाथ हर मजलूम के लिए सहारा हों
जो हर डूबती उम्मीद का किनारा हो
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो......
 
वो जो बदले तस्वीर समाज की
वो जो बने प्रतिछाया जनता के राज की
जो साहस में हिमालय हो
जिसका हृदय करूणा का देवालय हो
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो
 
जिसके पदचिन्हों पर चलने को उबले युवा रक्त
जिसके एक एक वचन का हर मन हो आसक्त
कर्म से श्रेष्ठ जिसके लिए कोई धर्म न हो
जन सेवा से पृथक जीवन का कोई मर्म न हो
एक जनप्रतिनिधी ऐसा हो
 
- रवि मिश्रा ( 06.12.2013)