Thursday, June 30, 2016

मैं गाँव देखता हूं


मिट्टी में सने अपने
मैं पांव देखता हूँ
यहां होती है बारिश
तो मैं गाँव देखता हूँ...

चल रहां हूँ बेसुध
हर पड़ाव देखता हूँ
जभी हुई है धूप तो
माँ सी छाँव देखता हूँ....

समंदरों के बीच मैं
अपनी नाव देखता हूँ
गिरते उठते मन के
कुछ घाव देखता हूँ...

बाज़ार में खड़ा हूँ
अपना भाव देखता हूँ
बाज़ी नहीं है मेरी
हर दांव देखता हूँ...

Thursday, April 21, 2016

अतृप्त गांव


क़तरा- क़तरा सब सूख गया
हर बादल ऐसे रूठ गया
वो गांव जो इतना प्यासा है
कुछ बूंदों की बस आशा है

पोखर का पानी मरने को है
वो बूढ़ा बरगद गिरने को है
धरती टक-टक देख रही
लेकिन मिटती ये प्यास नहीं

खाली खेत और ऊपर आग
कैसे फूटे अपने भाग
कंठ की प्यास बुझती नहीं
चलो चलें हम और कहीं

उनके गले जो तर हैं अब तक
सूखे कंठों की पीड़ा क्या जानें
कुछ मास प्यास के और हैं बाक़ी
अभी मौत की चलेगी झांकी

कोई देव हो ऊपर तो देखे
इस गांव पे टुकड़े कुछ तो फेंके
हर मौत पे जश्न मनाते हैं
वो रहनुमा यहां अब आते हैं

वादों की अर्थी पर लाशें
हर बार यहां सजती हैं
तमस घोर है कहां है दीप्त
ये गांव हमारा है अतृप्त
- रवि मिश्रा

Monday, January 4, 2016

सेक्यूलर भगवान

भगवान शुरू में आये तो सेक्यूलर ही थे। फिर सभ्यताओं के बर्चस्व की लड़ाई में वो धीरे-धीरे वो नॉन-सेक्यूलर की कैटेगरी में आ गये। आज जब देश की राजनीति ने भगवानों को आगे कर वोट का प्रसाद पाने की मुहीम छेड़ रखी है, जिसमें सिर्फ़ हिंदूवादी नेता ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यक वर्ग के झंडाबरदार भी है, पब्लिक में भारी कनफ्यूज़न है।किस गुट में जायें? यहीं नहीं बीच में रहने वाले स्वयंभू सेक्यूलर नेता लोग भी एक अलग फ्रंट बनाये हुए हैं। इस बीच कुछ सेक्यूलर देवताओं ने अच्छी ख़ासी लोकप्रियता बटोरी है। लोग किसी रिस्क में नहीं पड़ना चाहते। कनफ्यूज़न से बाहर निकलना चाहते हैं। ऐसे में सहारा बनते है यही सेक्यूलर भगवान। राजधानी दिल्ली में इन दिनों सबसे ज्यादा रेटिंग प्वाईंट साईं बाबा बटोर रहे हैं। यहीं हालत महाराष्ट्रा, दक्षिण भारत के राज्य और धीरे-धीरे उत्तर भारत में भी देखने को मिल रही है, जहां इन नॉन सेक्यूलर भगवानों का बोलबाला रहा है। साई बाबा के मंदिरों में जिस तरह की भीड़ और हाई प्रोफाईल मैनेजमेंट नज़र आता है, उससे उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। साईं एक सेफ साईड हैं। अभी तक किसी भी राजनीतिक दल या धार्मिक संगठन ने साई पर अपना दावा नहीं ठोका है। ठोकेंगे कैसे ,जगह ही नहीं है। तो भक्तों को इससे बड़ा लाभ है। भक्ति की भक्ति और किसी का वोट बैंक बनने या कहलाने से मुक्ति। हालांकि साई के काम्पीटीशन में शनि महाराज भी है। साथ ही हैं कुछ बाबा टाईप लोग। नाम लेना सेफ़ नहीं हैं क्योंकि उनके भक्तों की संख्या भी अच्छी ख़ासी है इनक्लूडिंग नेता, अभिनेता और बाहुबलि। इसके अलवा कुछ पीर मज़ार भी हैं जो सेक्यूलर भगवानों की कैटेगरी में शामिल किये जा सकते हैं। सवाल है कि इनकी पॉपुलैरिटी इस राम के देश में जिनको भी कुछ दलों नें अपने लिए पेटेंट करा लिया है, कैसे बढ़ती जा रही है। दिल्ली के लोधी कॉलोनी के साईं टेंपल जाईये गुरूवार को। दिमाग की सारी बत्तियां खुल जायेंगी। बहरहाल एक कारण जो मेरे दिमाग में है वो ये है कि लोग पहले तो 'किस पथ जाऊं' वाले सवाल की तर्ज पर कंफ्यूज़ हुए फिर धीरे- धीरे बोर भी । लोगों को कुछ नया चाहिए था जिसमें भगवान और उनके बीच किसी का हस्तक्षेप न हो। मामला डीटीएच का था यानि डायरेक्ट टू हार्ट। बीच में कोई रूकावट के लिए खेद नहीं चाहिए था। अपने टाईप के नियम हों, अपने टाईप की पूजा। बस इस टाईप में सबसे परफ़ेक्ट नज़र आये सेक्यूलर भगवान साईं बाबा। बाबा को चढ़ने वाले प्रसादों में आप भक्तों की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति देख सकते हैं आप। अभी तो साईं की भक्ति अपने चरम पर है। डर इस बात का है बढ़ती भक्तों की संख्या और दान उन्हे किसी कैटेगरी में न डाल दे। किसी दल ने अगर उन्हे पेटेंटे करने का दावा ठोका तो जनता कहां जायेगी। किसी और सेक्यूलर भगवान की तलाश में ।

Tuesday, July 7, 2015

कुछ तो चटकता है हर रोज

कुछ तो चटकता है हर रोज
जैसे पुरानी कोई दीवार हो
और सूखी पपड़ियां
टूट के गिरती हैं


हर बार मन तय करता है
 हर बार लड़खड़ाते हुए
कहीं और
कहीं और भटकता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज


कुछ एक पाए थे जिनपर
किसी की झोपड़ी टिकी है
अब जो वो भी हिल रहे हैं
तो मन
उन्हीं से लिपटता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज


जो बदल पाए हैं अबतक
उसी से मुत्तमईन नहीं हैं
जो मिल सका न हमको
उस ओर
सफर निकलता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज








Monday, December 1, 2014

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया



अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया
होलिया ना रहे रे उदास
बरस-बरस कोरा रही गइल अंगना
कब ले करीं हम आस

चउखट सूना रहे सूना रहे घरवा
अंखवा रहेला उदास
जाने कौन बेरा होई सुनहे हो राम जी
बानी हम अंचरा पसार

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया..

कोनो रंग चढ़े नाही, मन में जीवन में
कोनो गीत सरगम न ताल
जोने कब फगुआ सुनाई हमरो दुअरा
जाने कब बाजी कौनों झाल

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया...

बरस भईल अब काटे ला दलनवा
तहरा के खोजे दिन रात
अबकी न अईब त जाने कब अईब
केकरा से कहीं मन के बात

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया...

काहे कईल नोकरी बन परदेसिया
माई माटी दूनो से तू दूर
जाने कब सुनब तू इनके अरजिया
कब ले इ मन मजबूर

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया
होलिया ना रहे रे उदास
बरस-बरस कोरा रही गइल अंगना
कब ले करीं हम आस
                                                   -   रवि मिश्रा ( 01.12.2014)


Sunday, November 30, 2014

भोर भईल


भोर भईल अब जाग साथी
रात अन्हरिया भागल साथी

पहिला किरण से जग उजियारा
दूर कहीं छुप गएल अंधियारा
घोर निरासा भागल साथी
आस के लाली छा गएल साथी

भोर भईल अब....

लेके के हरि के नाम तू जाग
जीवन के ताल पर तू हो भाग
एगो नया दिन आ गएल साथी
जीवन दर्शन बुझा गएल साथी

भोर भईल अब....

रात के बाद उजाला ही होला
जग के गति कभो कहंवा रुकेला
कर्म में अपना लाग हो साथी
इहे धरम बा जान हो साथी

भोर भईल अब....

सुख जइसे अंतिम सच ना ह
दुख भी ओइसे ही अमर कहां ह
चक्र चलेला हर दम हो साथी
करत जा आपन करम हो साथी

भोर भईल अब....













Friday, November 28, 2014

भोजपुरी का ह...




भोजपुरी का  ह
परदेस में मजदूर के मन के आसा ह
जौन कान में घुलजाए उ बतासा ह
इ बस बोली ना आपन मन के भासा ह

भोजपुरी का ह
उमंग, उत्साह , जीवन के संचार ह
दिल के गंगा जुबान से बहे उ प्यार ह
आचार ह , विचार ह ,व्यवहार है, आपन संसार ह

भोजपुरी का ह
लड़काई में दुलार के नाम ह
ए संसार में आपन पहचान ह
आन ह, बान ह , सान ह

भोजपुरी का ह
आपन जड़ ह, जवार ह
एगो बंधन हमार तहार ह
पोखर,घाट, बगईचा, अंगना दुआर ह

भोजपुरी का ह
छठ ,दिवाली, ईद, मुहर्रम ह
हर बिदेसिया के मन के मरहम ह
दया, प्रेम ,भाईचारा मेहनत ,परिश्रम ह

भोजपुरी का ह
सरसों, मकई, मसूरिया ,धान ह
खेत में पसीना बहावे उ किसान ह
सबके पेट भरे ओकरा के एगो प्रणाम ह

भोजपुरी का ह
सतुआ-सतुई, अचार , खटमिट्ठी ह
दही ह , चिउड़ा ह , चोखा लिट्टी ह
हर निवाला में प्रेम बा उहे मिट्टी ह

भोजपुरी का ह
माई-बाबू जी के दुलार ह
जीवन में सुख के बयार ह
हमार अस्तित्व ह, हमार आधार ह

-    रवि मिश्रा (29.11.2014)