Thursday, May 3, 2018

गर्मी की छुट्टियाँ.....



कड़ी धूप वाली
धरती धूल वाली
दोपहर जो ऊंघी
पलक बंद कर सोने वाली
वही जेठ फिर से जी जाने का मन है.

घरों से निकलके
जलते तलवों पे चलके
यारों दोस्तों से मिलके
कभी खुसफुसा के
तो कभी वो हल्ला मचाने का मन है.

नींबू पानी की धारें
बचकानी जीभ के चठखारे
आम का पन्ना
फेरी वाले का ठंडा
फिर जीभ को आज ललचाने का मन है.

स्कून न जाना
रोज छुट्टियां मनाना
हम से ही भरे वो खाली से दिन
मन की करें वो मवाली से दिन
आज गली की पछुवा में झुलस जाने का मन है.

                             - रवि मिश्रा

Saturday, April 7, 2018

किसान

खेतों से क्यूं उग आई हैं ये लाशें
चलों इन मुर्दों को कुछ और तराशें...

कुदरत का इंसाफ या कोई कहर हैं
रात सी काली हर रोज सहर है...

निजाम ने कोई फिर ऐलान किया है
दहका (किसान)की चुप्पी का इंतजाम किया है...

जिसकी औलादें जवानी में बूढी हो जाती हैं
जिनको मौत तय वक्त से पहले आती है...

जिसके पसीनेे से सींचा अनाज तू खाता है
ऐ मुल्क तुझे मरता वो किसान नजर आता है...

Monday, March 19, 2018

लेफ्ट या राइट


थोड़ा बाएं मुड़ जाने का मतलब लेफ्ट नहीं होता है
 कुछ दाएं झुक जाने का मतलब राइट नहीं होता है
कुछ बहस वहस होती रहे
पर हर शोर का मतलब फाइट नहीं होता है

तब जब वेदों पर
 टीका की थी कभी उपनिषदों ने
 तब जब ब्राह्मण चाणक्य
 सत्ता से भिड़ा जनपदों में
तब जब चरक मुनि ने
 शूद्र वर्ण अपनाया
 तब जब शंकर ने कभी
 अद्वैत मार्ग दिखलाया
ये सब तब बाईं तरफ झुके थे
 तुम देखो ये कौन थे
ये राइट थे या लेफ्ट थे

 विश्वामित्र ने तब जब
 ब्राह्मण बनने की ठानी
 रैदास ने धर्म का मार्ग चुना
तो किसी ने दी गुरुबानी
और गांधी जो राम नाम रटते थे
 और नरेंद्र जो हिन्दू हूँ
गर्व से कहते थे
और अकबर जिसने
दिया दीन का नारा
 और दयानंद जिन्होंने
प्रस्तर पूजन से किया किनारा
और जो एक ख़िलाफ़त की खातिर
 सब निकले सड़कों पर
तब हां
 तब भी वो कुछ राइट की ओर मुड़े थे
अब तुम देखो
 वो राइट थे या लेफ्ट थे

वो बुद्ध थे
जो थोड़ा लेफ्ट मुड़े
 और मध्यम मार्ग को खोजा
वो मुहम्मद थे
जो थोड़ा राइट मुड़े
और नए विचार को जोड़ा
 वो एकलव्य था जो राइट मुड़ा
पर दक्षिण की दीवारों को तोड़ा
 वो शून्यदशमलवगणितज्योतिष
सबकुछ दक्षिण मार्ग से आये
 वो कबीर , मीरारहीमनानकरसखान
क्यों भक्ति काल के कहलाए
ये सब अपने अपने मार्ग गए थे
अब तुम देखो ये राइट थे या लेफ्ट थे... –

 रवि मिश्रा( 26.9.2017)


Wednesday, March 7, 2018

प्यास

मेरी प्यास भली है ओस की
दरिया क्या उसे बुझायेगा
सूखेगा सब एक रोज़ तब
बूंद से सागर बन जायेगा

नीच

हां तू है नीच
न बोलता है
न खौलता है
सबको तौलता है
सिर झुका के चलता है
दुम दबाके यूँ निकलता है
वक़्त के साथ तू बदलता है
चंद सिक्कों पर तू फिसलता है
झूठे सियासत के वादों पर मचलता है
जो तुझसे कमज़ोर है उसे ही मसलता है
झूठे अहंकार से तेरा अहम बढ़ता पलता है
एक हाथ भीख की रोटी दूजे में तलवार ले निकलता है
तेरी खाल के भीतर ये कौन सा जानवर हर वक़्त पलता है
तू कौन है...गौर से देख खुद को...हां तू नीच है..

मौसम

मौसम मन के कहां ले उड़े
याद के केतना गाँठ खुले
तन बंधिक मन पंछी अलबेला
कहां - कहां ना इहो उडे़ला
हवा -लहर पर बा सवार
घूम आवे इ सागर पार

चाहिए सबकुछ

उगता सूरज और डूबता भी
नदी भी और सागर भी
झील भी, बर्फ की चादर भी
चाहिए सबकुछ ही 
नहीं तो कुछ भी नहीं

वृक्ष बनूं

एक वृक्ष बनूं ....
जड़ से जुड़ा
नभ को उन्नत
फलदार विनम्र
विकास सतत
सब घाव लूँ
बस छावं दूँ
यूँ दक्ष बनूं
एक वृक्ष बनूँ ...

Tuesday, January 23, 2018

अछूत सुदामा


विप्र सुदामा वेटिंग रूम में थे
तभी कृष्ण का लेटर मिला

राजमहल के मित्र कृष्ण ने
बाल सखा सुदामा नहीं
एक ब्राह्मण को पत्र लिखा

हे सुदामा!
महल द्वार तक आए हो
मेरे लिए क्या लाए हो
तुम मित्र हो मेरे प्रिय सखा
एक थाल में हमने
कभी भोजन था संग चखा
पर आज यहां मैं राजा हूँ
मेरी कितनी मजबूरी है
तुम सवर्ण हो फिर कलयुग में
इसी बात की दूरी है
मन जानता है मुझे
प्रेम है तुमसे
पर अपनी पीड़ा
कहूँ मैं कैसे
तुमको गले लगाया तो
मैं दलित विरोधी कहलाउंगा
और सुदामा
तुम्हारे कारण
अगला चुनाव हार जाउंगा
मेरी जाति मेरा यदुवंश
मुझसे दूरी कर लेगा
कोई पिछड़ा कभी मुझे
अपना वोट नहीं देगा
हाथ मेरे बांध दिए हैं
सत्ता की जंजीरों ने
राजमहल में कैद हूँ मैं
घिरा हूँ कितनी लकीरों में

हाँ!
एक रास्ता है अभी
मिल सकता हूं मैं तभी
त्याग दो ये गेरूआ
त्याग दो तुम शिखा
त्याग तो ये यज्ञोपवीत
त्याग दो अपना वंश अतीत
धर्म बदल लो तो बेहतर है
कर्म बदल लो तो बेहतर है
तब मैं जनता के समक्ष
तुमको गले लगाऊंगा
पिछड़े होने का सर्टिफिकेट
तुम्हारे लिए बनाऊंगा
मेरे वोटबैंक पर भी
कोई आंच न आएगी
ओ भोले!
मेरे मित्र सुदामा
ब्राह्मण होने की बदनामी
मुझको नहीं डराएगी
मित्र हो तुमसे मैं अपने
मन की बात बताता हूँ
तब की बात अलग थी
अब मैं लोकतंत्र का खाता हूँ
बस छोटी मजबूरी है
इसी वजह से दूरी है
तुम अछूत हो लोकतंत्र के
तुम अनटचेबल इस तंत्र के
आज मैं यूं मजबूर हूँ मित्र
राजनीति वश दूर हूँ मित्र
नथिंग पर्सनल
तुम्हारा कालजयी मित्र
कृष्ण

सुदामा पत्र को देख रहा
मन ही मन ये सोच रहा
फटी हुई इस थैली में
जो चना वो वो ले के आया था
जिसको द्वापर में माधो के संग
खूब मज़े खाया था
उसको कैसे लौटा ले जाऊँ
निर्धन विप्र सुदामा सोचे
वही पुराना मित्र कन्हैया
इस भारत में कहां से पाऊँ

- रवि मिश्रा