खेतों से क्यूं उग आई हैं ये लाशें
चलों इन मुर्दों को कुछ और तराशें...
कुदरत का इंसाफ या कोई कहर हैं
रात सी काली हर रोज सहर है...
निजाम ने कोई फिर ऐलान किया है
दहका (किसान)की चुप्पी का इंतजाम किया है...
जिसकी औलादें जवानी में बूढी हो जाती हैं
जिनको मौत तय वक्त से पहले आती है...
जिसके पसीनेे से सींचा अनाज तू खाता है
ऐ मुल्क तुझे मरता वो किसान नजर आता है...
चलों इन मुर्दों को कुछ और तराशें...
कुदरत का इंसाफ या कोई कहर हैं
रात सी काली हर रोज सहर है...
निजाम ने कोई फिर ऐलान किया है
दहका (किसान)की चुप्पी का इंतजाम किया है...
जिसकी औलादें जवानी में बूढी हो जाती हैं
जिनको मौत तय वक्त से पहले आती है...
जिसके पसीनेे से सींचा अनाज तू खाता है
ऐ मुल्क तुझे मरता वो किसान नजर आता है...
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