Saturday, June 29, 2013

कितने आजाद ?



आज़ाद सा कोई लब
आजाद सा कोई रब
कई दिनों से मिला नहीं
गुलाम हूं मैं भी
सो कोई गिला नहीं

नसों में दौड़ता लहू
अरसे से लाल नहीं
सपनों की कब्र हर रोज बनाते हैं
यहां अब इसका मलाल नहीं

अभी किसी ने कहा
इक बार मरो हर रोज नहीं
अभी तो उसने मरना शुरू किया ही होगा
उसका कोई दोष नहीं

मेरे आगे की नस्लें
ज़जीरों में जकड़ी क्यूं नजर आती हैं
अरे दीवाना हूं मैं भी
वही ज़जीरें मुझे भी तो हर रोज खाती हैं

खुदा तो है कहीं
ये यकीन छोड़ा नहीं अबतक
कोई करिश्मा नहीं करेगा वो
तो ये यकीन भी रहेगा कबतक

बात रोटी की होती
तो गरीबी भी चुप ही रहती
बात भूख की है
जो अमीरी की कभी नहीं मिटती

दिया तेरे घर में रौशन जो होता
तो मेरे उजालों को भी नजर न लगती
फिर न सड़कों पर हर बात पे हंगामा होता
मेरी आवाज भी फिर बेअसर न लगती

                                     - रवि मिश्रा- 30-6-2013







Friday, June 28, 2013

डॉन्कीक्रेसी



गधर्व देश की गधा महापंचायत बैठी हुई थी.छोटे-बड़े, अमीर, गरीब, पत्रकार, वकील, दबंग आदि-आदि सभी मौजूद थे.मुखमंडल पर गंभीर आभा.विषय भी गंभीर.गर्धव देश के तमाम राजनीतिक दल और समूह भी मौजूद थे.आज तय होना था कि दूसरे देशों के लगातार हो रहे हमलों से निपटने के लिए क्या किया जाए ? रोज-रोज बाहरी आक्रमण हो रहे थे.आतंकी जानवर देश में आतंक फैला रहे थे. गधों की जंगल में कोई इज्जत नहीं रह गई थी. गधर्व आत्मसम्मान को भारी धक्का लगा था.

दरअसल गधर्वदेश जंगल का सबसे बड़ा डेमोक्रेटिक देश था.गधों को मूखर्ता का प्रतीक माना ही जाता है.अहिंसक और लेबोरियस तो वो नेचर से होते ही है. इनके पुरखों ने जब डेमोक्रेसी के विषय में ये सुना कि डेमोक्रेसी को मूर्खों की सरकार भी कहा जाता है, तभी ये तय कर लिया कि इस देश में डेमोक्रेसी ही होगी क्योंकि पूरे जंगल में मूर्खता का असली प्रतीक तो गधर्वदेश के गधे ही हैं.सो तब से डॉन्कीक्रेसी को डेमोक्रेसी में तब्दील कर दिया गया. लेकिन शांत, अहिंसावादी, दूसरों पर हमला नहीं करने वाले गधर्वदेश के नागरिकों को क्या पता था कि उनकी इस खूबी को जंगल के दूसरे देश मसलन सिंहआइना, लोमेरिका और खासकर पड़ोसी देश फॉक्सिस्तान कमजोरी समझेंगे और इन्हें परेशान करेंगे.घास चबाने वाले ये गधे कई बार इनकी चालों का शिकार हुए. हद तो ये हो गई कि सिंहआइना और फॉक्सिस्तान आपस में मिल गए और उनके इशारों पर गधर्वदेश में हर रोज आतंकी हमले होने लगे. इसी गंभीर मुद्दे पर आज गधा महापंचायत बुलाई गई थी . गधों ने तय किया कि देश के तमाम दल यहां जुटेंगे और एकराय कायम करेंगे कि कैसे राष्ट्र पर आई इस विपदा से निपटा जाए.

बहरहाल बैठक की अध्यक्षता गधों के चुने हुए, देश के मुखिया चुप्पा चोर सिंह कर रहे थे.ये अपने नाम के अनुरूप थे. देश में सारी चोरी इन्हीं की देखरेख में होती थी लेकिन वो चुप रहते थे.इनकी चुप्पी को देशभर में ईमानदारी और सज्जनता का प्रतीक माना जाता था.देश के कई हिस्सों के मैदानों की घास गायब हो रही थी और उसकी कालाबाजारी की जा रही थी.गधे भूखों मर रहे थे.कई इलाकों में तो गरीब गधे परिवार समेत आत्महत्या भी कर रहे थे.लेकिन मुखिया चुप्पा चोर सिंह चुप चाप देखते रहते. कभी जब मुंह खोलते तो एक ही बात बोलते- ढेंचू...ढेंचू...ढेंचू....जल्द ही सब ठीक हो जाएगा...आप भरोसा रखिए...सरकार अच्छा काम कर रही है ...ढेंचू..ढेंचू..ढेंचू...पिछले 10 सालों से हर सवाल का वो यही जवाब दे रहे थे.

सभा कि शुरूआत गधर्वदेश के पारंपरिक गान से हुई...सभी गधे खड़े हो गए....सिर आकाश की तरफ उठाया...आंखे बंद...एक सुर में- ढेंचू....ढेंचू....ढेंचू.... गान के बाद अब बारी थी उस विषय पर चर्चा की जिसके लिए सभा बुलाई गई थी...विपक्ष की पार्टी ऑल गदेपा, यानि ऑल गधर्व देश पार्टी, जो कंजरवेटिव विचारधारा के करीब थी ,जो गधों के शुद्ध रक्त की विचारधारा का समर्थक मानी जाती थी और उसमें ज्यादातर वो लोग थे जो डॉन्कीक्रेसी के जमाने की बातों के पक्षधर थे. ऑल गदेपा ने आरोप लगाया कि एक जमाने में गधों का बोलबाला था.हमारी लताड़ में कितनी ताकत थी.गधों की अस्मिता कितनी उंची और महान थी.इतिहास गवाह है कि एक झुंड में जब हम चलते थे तो मजाल है कि कोई हमला करने की सोचे.ये केवल इस लिए था क्योंकि उस समय हमारी नस्लें ठीक थीं और हमारी टांगों में इतनी ताकत थी कि हमारी लताड़ से जंगल का हर आतंकी जानवर डरता था.हमें फिर से गधों के उसी सुनहरे काल की ओर लौटना होगा.हमारे गधेपन का फायदा उठाकर गधों की अजीब-अजीब नस्लें यहां आकर रहने लगी और आज हालत ये है कि फॉक्सिस्तान जैसे देश जिसकी कोई औकात नहीं थी वो भी हमारे लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं.हमारी मांग है कि गधों की शुद्ध नस्लों को बढ़ावा दिया जाए और हर जगह लताड़ ट्रेनिंग सेंटर खोला जाए ताकि हम लड़ाकू गधों की एक नस्ल तैयार कर सकें.इनता सुनना था कि चूकिया पंथी गधे उठ खड़े हुए और जोर-जोर से ढेंचू-ढेंचू-ढेंचू करने लगे .सभा में शोर होने लगा.कोई किसी को सुनने को तैयार नहीं था.पर देश के मुखिया चुप्पा चोर सिंह जी विनम्र भाव में, एक इंटलेक्चुल की तरह मुस्कुराते रहे और गधों के प्रतिनिधियों को आपस में ढेंचू- ढेंचू करते देखते रहे.

किसी तरह से थोड़ी देर में आपसी ढेंचू-ढेंचू बंद हुआ तो चूकिया पंथी  नेताओं ने कहना शुरू किया.लेकिन ये भी जानिए कि इन्हे चूकिया पंथी क्यों कहा जाता है.दरअसल ये दोनों ही व्यवस्थाओं के खिलाफ है.डेमोक्रेसी और डॉन्कीक्रेसी.इनका मानना है कि दोनों ही व्यवस्थाएं गजुर्वा(संभ्रात) वर्ग के हितों की रक्षा करती है, जबकि गधर्वहारा(आम ,कमजोर गधे )  वर्ग का हमेशा से ही शोषण होता आया है .रक्त शुद्धता के नाम पर एक तरफ जहां देश में गधों में फर्क पैदा किया गया वहीं डेमोक्रेसी के नामपर आम गधों को बेवकूफ बनाया गया.चूकिया पंथी सिंहाआइना के शासनतंत्र के समर्थक माने जाते थे.उनका कहना था कि वहां हर नागरिक सिंह है.कोई फर्क नहीं है.यही वजह है कि आज वो सबसे मजबूत हैं. हमें उनसे दोस्ती करनी चाहिए. उनके लिए भोजन का इंतजाम करना चाहिए. हमारी तादाद इतनी है कि अगर कुछ रेग्युलर बेसिस पर दे भी दें तो कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा और देश में शान्ति बनी रहेगी.

आम गधा जन ने आज तक चूकिया पंथियों को पूरी तरह से अपनाया नहीं.उन्हें डर था कि सत्ता में आने के बाद ये लोग देश को सिंहाआइना के भरोसे छोड़ देंगे.जनता चूकिया पंथियों को कभी पूरी तरह से वोट नहीं देती थी.वो हर बार सत्ता से चूक जाते थे.वो चूके हुए लोग थे, यही वजह है कि उन्हे चूकिया पंथी कहा जाता था.

इधर चुप्पा चोर सिंह चुप चाप सब सुन रहे थे.बीच-बीच कुछ समाज सेवी और पत्रकार भी चिल्ला रहे थे. नेताओं के खिलाफ नारे लग रहे थे. आम गधों में काफी गुस्सा था.पंचायत भवन के बाहर हंगामा चल रहा था.हर तरफ बेचैनी थी कि इस महापंचायत में क्या फैसला होगा ? हर रोज के हमलों और अपमान से जनता त्रस्त थी. इसी बीच कुछ और छोटे दलों ने जो अमूमन मौका परस्त थे और अपने हितों के हिसाब से बात करते थे अपनी बात रखी. उनके पास कुछ खास कहने को नहीं था. अंदरखाने चुप्पा चोर सिंह की पार्टी से मिले हए थे सो इधर –उधर की बात की. हमेशा की तरह उंचे सुर में ढेंचू-ढेंचू किया और फिर शांत हो गए.

 

अब आखिर में चुप्पा चोर सिहं को फैसला देना था. पर वो तो अपनी तबियत के अनुसार कोई फैसला- वैसला तो लेते नहीं थे. उनका हर फैसला आउटसोर्सड होता था. वो उठे , बडी ही मधुरता के साथ पहले ढेंचू-ढेंचू किया, फिर बोले- मेरे प्यारे भाईयों और बहनों जैसा कि आपको पता है, आज गधों के देश में बाहरी हमले एक बड़ी चुनौति हैं. सबके मन में यहीं चिंता है कि जंगल के सबसे बड़े डेमोक्रेटिक नेशन को कैसे बचाया जाए. बैठक से पहले मैने लोमेरिका के मुखिया लोबामा से बात की और अपनी चिंताएं ऱखीं. आपको तो पता ही है कि लोमेरिका की नीति आज सबसे सफल नीति है. लोबामा ने कहा कि आज से कोई भी लोमड़ी गधों पर हमला नहीं करेगी जबतक कि उसे भूख न लगे. बेवजह किसी का खून नहीं बहेगा और किसी सिंहाइना या फॉक्सिस्तान ने ऐसा किया तो लोमेरिका गधर्वदेश के साथ है. बस हमारे हितों का ध्यान रखा जाए. वैसे भी हमने ऐसे देशों को हिंसक और जंगल के शैतानों की धुरी करार दे दिया है.अब से कुछ शर्तों के साथ गधर्वदेश और लोमरिका हर चुनौति का सामना साथ साथ करेंगे. दोनों घनिष्ठ मित्र हैं.

विपक्षी पार्टी ऑल गदेपा के मुखिया चुप थे.भई सत्ता का स्वाद वो भी ले चुके थे.घनिष्ठ मित्रता का मतलब वो जानते थे.ये शब्द सुनते ही उनकी आंखों में लोमेरिका देश में दूर दूर तक फैली स्वादिष्ट, हरी –हरी और मुलायम घास की तस्वीर खिंच गई.मुंह में पानी आ गया. आहा.. हा..हा... हा ...क्या दिन थे वो.10 साल से तो नसीब ही नहीं हुआ.साला ये चुप्पा चोर सिहं और उसी फौज लोमेरिका जा कर छक कर मजे लेते है. और हम यहां देसी घास खा रहे हैं.पर क्या करें सत्ता में आने  तक लोबामा ने चुप रहने को कहा है.नहीं तो देश में बैठे – बैठे छठे छमाही उनकी तरफ से जो हमें थोड़ी बहुत घास कॉन्फिडेंस बिल्डिंग के नाम पर मिल जाती है वो भी नहीं मिलेगी.

पर दूसरी ओर चूकिया पंथियों को लोमेरिका फूटी आंख नहीं भाता. उन्होने हंगामा शुरू कर दिया तो चुप्पा चोर सिंह ने कहा कि ज्यादा ढेंचू-ढेंचू करने की जरूरत नहीं है हमने अपना एक–एक प्रतिनिधी मंडल सिंहआइना और फॉक्सिस्तान भेजा था. वो आगे बोले- सिंहाइना ने तो कहा है कि हम भी आपके यहां अपने नेता भेजेंगे. उनकी अच्छी खातिरदारी किजिएगा. कोई कमी न रहे. फिर हम कोई विचार करेंगे. तबतक स्टेटस क्यो यानि यथावत स्थिति बनी रहेगी.चुप्पा चोर सिंह ने पंचायत को ये जानकारी दी कि अगर सिंहआइना का गधर्वदेश की ओर से कोई विरोध नहीं किया गया तो बदले में सप्ताह के दो दिन उनकी ओर से किसी भी तरह का हमला नहीं होगा. गरदन थोड़ी उंची कर चुप्पा चोर सिंह ने आगे कहा - ये हमारी सरकार कि बड़ी उपल्बधि है.इससे गधों पर हो रहे हमलों में कमी आएगी.चूकिया पंथियों ने इस कदम का जोरदार स्वागत किया.

 

इस बीच विपक्षी पार्टी ऑल गदेपा के नेता ने उठकर कहा कि सबसे खतरा तो बगल के छोटे से देश फॉक्सिस्तान से है. उनका भरोसा नहीं किया जा सकता. उन्हें सबक सिखाना होगा. इस सवाल पर चुप्पा चोर सिंह जी ने कहा-  फॉक्सिस्तान से हमने कड़े शब्दों में कहा है कि वो केवल नैचुरल डेथ वाले गधों को खा सकते हैं. हमले की इजाजत उन्हें नहीं है. अगर ऐसा हुआ तो गधों की फौज को लताड़ चलाने का हुक्म दे दिया जाएगा वो भी फॉकिस्तान के घर में घुस कर. फॉक्सितान ने अमन बहाली के लिए हमारी बात को मान लिया है .

सभा समाप्त हुई.प्रेस के सामने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी गई कि कैसे सभी देशों ने भरोसा दिलाया है कि गधर्वदेश पर बेवजह हमले नहीं होंगे और कैसे सरकार ने सफल कोशिश की है ताकि एक ज्यादा सुरक्षित गधर्वदेश बनाया जा सके. जहां तक देश के अंदर नए कानून बनाने की बात है तो आज से पूरे देश में राइट टू लताड़ दिया जाएगा.इसके लिए ट्रेनिंग सेंटर खोले जाएंगे, जिसमें सभी को ट्रेनिंग दी जाएगी कि कैसे लताड़ कौशल से सिंह या लोमड़ी के हमलों को नाकाम किया जा सकता है.जनता थोड़ी कन्फ्यूज थी कि लताड़ से नखों, पंजों और नुकीले दांतो का सामना कैसे किया जाएगा ? फिर भी आम गधों के पास कोई चारा तो था नहीं.सो अधूरे विश्वास के साथ ये फैसला मान लिया गया .

एक महीने बाद.गधर्वदेश में हहाकार मचा हुआ था.सिंहआइना के हमले पहले से ज्यादा हो गए क्योंकि उसने दो दिन हमले न करने के नाम पर सप्ताह के पांचों दिन दुगने हमले किए. पांच दिन का लाइसेंस उनके पास था सो उन्हें अब रोका नहीं जा सकता था.दूसरी ओर लोमरिका का लालच सातवें आसमान पर था.अपने हितों के नाम पर वो आए दिन तरह-तरह के बहाने बनाकर गधों का शिकार कर रहे थे और उसे जस्टिफाय भी कर रहे थे. हद तो फॉक्सिस्तान ने कर दी थी. उसके यहां के हमलावर दूसरे जानवरों भेष में आकर प्रॉक्सी वॉर कर रहे थे.पता ही नहीं चल पा रहा था कि असल में  वो हैं कौन ? साथ ही वो सिंहाइना और लोमरिका के छोड़े हुए शिकार का भी आनंद उठा रहे थे. इधर चुप्पा चोर सिंह अपनी टीम के साथ अपनी उपलब्धियों का बखान पूरे गर्धव देश में घूम –घूम कर रहे थे.दरअसल इसी बहाने वो देश के अलग-अलग इलाकों के घास का आनंद ले रहे थे. इधर चूकिया पंथी सिंहाइना के घास का आनंद ले रहे थे क्योंकि उन्होंने सिंहाइना के प्रेसिडेंट को कनविंस कर लिया था कि मौजूदा व्यवस्था उनकी कोशिशों की वजह से हैं.साथ ही उन्होंने लताड़ ट्रेनिंग को फेल करने का नुस्खा भी दिया था सिंहाइना को.गधों पर पीछे से नहीं सामने से उनकी गरदन पर हमला करें.बस क्या था एक भी हमला नाकाम नहीं जा रहा था .ऑल गदेपा ये सारा माजरा देख रही थी.सबकुछ जानते हुए भी चुप थी.अच्छा ही था चुप्पा चोर सिहं की सरकार बदनाम होकर गिर जाएगी तो उन्हें ही सत्ता मिलेगी.और फिर लोमेरिका के हरे हरे , मुलायम घास के मैदान.बहरहाल शायद जनता गधी थी इसीलिए वो ये सब भोगने को मजबूर थी क्योकि उन्होंने डॉन्कीक्रेसी को अंदर से अबतक अपना रखा था.डेमोक्रेसी को समझने की कोशिश ही नहीं की. नतीजा गधर्वदेश को ऐसे नेता और मुखिया मिलते रहे.

 

-         रवि मिश्रा

27.06.2013

Tuesday, June 25, 2013

जीवन सार





कहंवा के माटी, कहंवा के पानी
कहंवा के पावक, गगन, पवन
एक भएल सब बनल देह
चरखा लागल जनम-जनम

काया के बा रूप अनंत
माया के बा रूप अनंत
आस-पियास त बढ़त गएल
मिट न पाएल जीव भरम


बंधन गांठ त पड़त गएल
पग-पग पर सब मिलत गएल
उतराए के चाह में देखीं
जीवन नईया डूबत गएल

हार थाक मानव काया
मांगे मुक्ति के देव छाया
जग के इहे त रीत रहल
मुक्ति के ओर सब जनम-करम


रवि मिश्रा ( 26.06.2013)

Monday, June 24, 2013

भारतीय राष्ट्र की संकल्पना और धर्मनिरपेक्षता




देश में धर्मनिरपेक्षता को लेकर इस समय अद्भुत चर्चा चल रही है.खेमे बने हुए हैं.धर्मनिरपेक्ष ताकतें और गैरधर्मनिरपेक्ष ताकतें.और मजे की बात ये कि इनको मान्यता देने के लिए भी बड़े अजीब पैमाने हैं.बहस जितनी छिछली है मसला उतना ही गंभीर.कम पढ़े लिखे लोग ही नहीं बल्कि पढ़ा-लिखा एक तबका भी कई पहलुओं से अंजान है .लेकिन इस बहस में अपने तर्कों के साथ कुश्ती कर रहा है.सबसे बड़ा सवाल है ये है कि क्या किसी राष्ट्र की कल्पना बिना धर्म के हो सकती है? क्या दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां किसी धर्म को मानने वाला कोई समाज न हो ? सवाल तो धर्म की परिभाषा को लेकर भी है.और जब कोई राष्ट्र , या व्यक्ति या समुदाय खुद को धर्म-निरपेक्ष कहता है या होने का दावा करता है तो असल में क्या वो ईश्वर विरोधी है या नास्तिक या सभी धर्मों को मानता है ? क्या धर्म का प्रयोग राष्ट्र निर्माण में नहीं हुआ या नहीं होता ? और धर्म की भूमि भारत में धर्म की भूमिका राष्ट्र निर्माण में नहीं रही है ? अगर भारत में राष्ट्र की अवधारणा के साथ धर्म सतत रूप से जुड़ा रहा है तो धर्मनिरपेक्ष शब्द यहां के लोगों के लिए नया और अस्पष्ट है ?

हिंदू एक धर्म से पहले समुदाय है ...वो समुदाय जो सिंधु नदी के पास रहता था..हजारों साल पहले फारस के लोग का उच्चारण की तरह करते  थे. बस यहां से सिंधु की जगह हिंदू नाम का प्रचलन बढ़ा . भारत में रहने वाले वो लोग जो यहां के सनातन धर्म को मानते थे वो हिंदू कहलाए.वैदिक युग में इस समुदाय की कई शाखाएं निकली जो दर्शन की अलग अलग धाराओं को मानते थे. अचरज ये है कि वेदों से निकले उपनिषदों में पहली बार मौजूदा धर्म की कमिओं की आलोचना दिखी ..नई विचारधारा का जन्म होना शुरू हुआ....जिसका चरम हमने बौद्ध और जैन धर्म के रूप में देखा...ये और बात है कि इन धर्मों का भी बंटवारा होगा गया ..और इसकी भी कई धाराएं निकल गयीं...इन घटनाओं के समानांतर चाणक्य के काल में जब सिकंदर का आक्रमण हुआ तब चाण्क्य ने राष्ट्र की रक्षा का बीड़ा चंद्रगुप्त के साथ उठाया.निचली जाति के धनानंद को गद्दी से बेदखल कर चंद्गुप्त को गद्दी पर बिठाया. तब राजनीति में राष्ट्र बड़ा विषय था जाति नहीं .कौटिल्य शास्त्र में उन्होने राष्ट्र की अवधारणा दी.,,आपको यकीन ही होगा की आज के मुकाबले कहीं बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था चाणक्य ने दी जिसकी वजह से एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण हुआ...हिंदू राजा होने के बावजूद प्रशासन का स्वरूप धार्मिक नहीं था....बल्कि व्यवहारिक था...दक्षिण से लेकर अफगानिस्तान की सीमाओं तक भारत एक हिंदू राष्ट्र ही था...ब्राह्मण पुत्र चाणक्य का शिष्य चंद्रगुप्त जो शुरू में हिंदू था..उसने दक्षिण भारत में एक जैन के रूप में अंतिम सांसें लीं.....चंद्रगुप्त का बेटा बिंदुसार हिंदू रहा ..लेकिन बिंदुसार का पुत्र महान सम्राट अशोक पहले हिंदू फिर बौद्ध हुआ. दादा ने देश को एक हिंदु राष्ट्र के रूप में जोड़ा तो पोते अशोक ने राजनीतिक सीमाओं का विस्तार बौद्ध धर्म के सहारे किया .जो श्रीलंका तक पहुंच गया .उधर दक्षिण में सनातन धर्म वैष्णव और शैव दो कट्टर समुदायों में बंट गया ...और इस नाम पर जिस तरीके का राजनीति ध्रुवीकरण हुआ ...वो सारी हदें पार कर गया ..

सवाल ये है कि धर्म का जो राजनीति और सामाजिक पहलू है ....वो राष्ट्र की संकल्पना के साथ ऐसा जुड़ा रहा है जिसे अबतक अलग नहीं किया जा सका है ..क्योंकि राजनीति में इसकी उपयोगिता कभी समाप्त ही नहीं हुई ...

जब महमूद ग़जनवी ने भारत पर आक्रमण किया तो उसका मकसद इस्लाम का विस्तार नहीं बल्कि भारत को लूटने का था...लेकिन इस अभियान को भी उसने जेहाद का नारा दिया ...उसने कभी भारत में सत्ता स्थापित नहीं की ..वरन लूट के माल से गजनी प्रांत में अपनी सेना मजबूत की ...इस काम में गोरी ने थोड़ी बहुत पहल की ..और उसके सिपहसालार कुतुबद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्लतनत की नींव रखी...लेकिन ये कोई राष्ट्र जैसी संकल्पना नहीं थी....क्योंकि तबतक सभी धर्म और उसकी अनंत धाराओं ने क्षेत्रीय सीमाएं तय कर दीं थी...और वो अपने-अपने दायरे में बंधे रहे और एक दूसरे से लड़ते रहे. इसके बाद की एक बड़ी घटना बाबर से जुड़ी हुई है .खानवा कि लड़ाई के पहले बाबर ने अपनी सेना को एकजुट करने के लिए सबके सामने शराब के प्याले तोड़े और एक सच्चा मुसलमान होने का सबूत देने की कोशिश की .मकसद सत्ता हासिल करना था पर आधार धर्म बना क्योंकि इसके बूते वो मुस्लिम सरदारों को एकजुट कर मजबूत राणा सांगा की सेना को हरा पाया .पर धर्म का प्रयोग आधुनिक धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना के तर्ज पर बेहतरीन उपयोग अकबर ने किया ..दीने इलाही धर्म की शुरूआत के पीछे भी यही मकसद था कि सभी धर्मों के लोग उसे अपना राजा मान लें और मुगल सल्तनत में स्थिरता बनी रहे...ऐसा  नहीं था कि जहां राजनीतिक विरोध हुआ वहां केवल धर्म के आधार पर अकबर ने फैसले लिए....राजपूतों से पारिवारिक संबंध भी बनाए तो राजपूतों का दमन भी किया ...अकबर से कुछ पहले  सूफी धारा भी चली .बाद में हिंदू धर्म को वैचारिक स्तर पर जोड़ने वाले तुलसी दास भी हुए ..और नानक साहब ने सिख धर्म शुरू किया ..जिसने बाद में चल कर पंजाब में राजनीतक रंग ले लिया और राजा रंजीत सिंह के चरम पर आकर रुका. अजीब है कि जिस सिख धर्म की स्थापना शांति और सभी धर्मों को सम्मान देने के लिए हुआ..वो आखिर शुद्ध राजनीतिक और लड़ाकू समुदाय में तब्दील हो गया ...इसके समानांतर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के साथ मराठों ने भी अपनी राजनीतिक सीमाओं का जबदस्त विस्तार किया ...जो अंग्रेजों के समय तक मजबूत रहा ..

पश्चिम से आए यूरोपीय लोगों जिनमें अग्रेज, पुर्तगाली, स्पैनिश, डच जैसे लोग थे वो भी धर्म की अहमीयत समझते थे ..धर्म का सहारा लेते हुए उस दौरान भारत में तेजी से मिशनरियों की स्थापना हुई..ये बात भी महत्वपूर्ण है कि भारत के पिछड़े इलाकों में मिशनरीज ने अच्छा काम भी किया ...बाद में अग्रेंजो ने धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल की की परिपाटी शुरू की ..1857 की क्रांति ने उन्हे सजग कर दिया ....रेजिमेंट का निमार्ण धर्म और क्षेत्र के आधार पर किया ..मुसलमानों के लिए आरक्षण के मुद्दे को भुनाना शुरू किया .1909 के मार्ले मिंटो सुधार के नाम पर वो खुल कर मैदान में आ गए ....जिसका चरम भारत विभाजन के दौरान देखने को मिला ..जब धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ ..तो दूसरी ओर पाकिस्तान का गठन...ये फॉर्मूला इतना मजबूत रहा कि बाद के राजनेता भी इसे छोड़ नहीं पाए ..और आज भी हम राजनीतिक हितों के आधार पर धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट बंटते हुए देखते हैं.

वापस उस सवाल पर आते है कि क्या धर्म और राष्ट्र दोनों पृथक संकल्पनाएं हैं ? धर्मनिरपेक्ष जैसी संकल्पना जिसकी परिभाषा का साफ नहीं है ..और जो राष्ट्रीय कम राजनैतिक ज्यादा लगती है वो अबतक जमीन पर उतर क्यों नहीं पाई ? और जब बात समुदाओं के राजनैतिक हितों की है तो वो धर्म से जोड़कर क्यों देखे जाते हैं ? लड़ाई सस्ता और हितों की है .जिसे धर्म जामा पहनाया जाता है .इतिहास में इतने सबूत है जिसकी चर्चा के लिए पन्ने कम पड़ जाएंगे.राष्ट्र का विकास किसी धर्म या समुदाय से भी जुड़ा हो सकता है .शर्त ये है कि नेतृत्व कैसा है ? एक कमजोर शासक कभी भी मजबूत राष्ट्र नहीं दे पाया है .अगर राष्ट्र अक्षुण नहीं..उसी सीमाएं सुरक्षित नहीं..उसके लोग संपन्न नहीं...जनता अभाव और भ्रष्टाचार से त्रस्त हो ...वहां धार्मिक या धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट कुछ नहीं कर सकता....धर्म का वास्तविक पहलू आध्यात्मिक है जो कि व्यक्तिगत है.दूसरा पहलू जो दिखता है वो सामाजिक और राजनीतिक है ...जिसका ईश्वर से नहीं सत्ता और संघठन से संबंध है ....धर्मनिरपेक्षता भी धर्म के सापेक्ष खड़ी गई एक अस्पष्ट अवधारणा है ..सुविधा के हिसाब से इसकी परिभाषा बदली जाती है ..जिसके बूते राजनीतिक हित साधने के लिए एक वर्ग विशेष तैयार किया जाता है ...इस शब्द से परे समय समय पर भारत का समाज खुद को हमेशा बदलता और सामंजस्य स्थापित करता रहा है .फिर चाहे राज और काल किसी का भी हो

रवि मिश्रा (25.062013)

Sunday, June 23, 2013

CALL IT DREAM





Thus we cross the line
Untied, not hindered
Touching next shore of time

Mums of periods are broken
And hearts are uttering
As wished in years
With glees and cheers

Wounds unstitched
Healed and cured
Tears see happiness
Smiles assured

We touch the ground
And sway to clay
Stroll in the sky
Going far away

Having the moon
Full of palm
Sliding over sea
Stretched and calm

Chirping with birds
Napping in nest
World in arms
Nothing rest


Call it a dream
But they do live
Till the last breath
Under the eyelid, beneath

-          RAVI MISHRA
24.06.2013

Saturday, June 22, 2013

एक भूखंड





निर्जन, एकांत, अनछुआ
एक भूखंड छोड़ देना

जहां दूभ के तिनके
अपनी तरुणाई को जीते रहें
सदियों तक
जहां खग के झुंड
कलरव करें यहां -वहां
वादियों तक
वन के ऐसे जीवन को
जीवंत छोड़ देना
एक भूखंड छोड़ देना
 नदियां रहें
अविरल, निर्मल
जीव-जंतु बसे
जंगल जंगल
कंदराओं घोंसलों में लौट जाना हो
ऐसी गाढ़ी श्यामल
निशा हो
भोर का सूरज हर पलक खोल दे
उजालों में सनी
हर दिशा हो
तय मास में जो आए
वो वसंत छोड़ देना
एक भूखंड छोड़ देना


हिम की दुशाला ओढ़े
शैल शिखाएं
मरू का भी हो विस्तार
न हो सीमाएं
मानव पग ना पड़े हों
नैसर्गिक सा ही रहे
जीवन के आधार जहां
प्रकृति से जुड़े हों
धरा का एक ऐसा रूप
एक ऐसा ही रंग छोड़ देना

निर्जन, एकांत, अनछुआ
एक भूखंड छोड़ देना

-          रवि मिश्रा
23.06.2013