Tuesday, July 7, 2015

कुछ तो चटकता है हर रोज

कुछ तो चटकता है हर रोज
जैसे पुरानी कोई दीवार हो
और सूखी पपड़ियां
टूट के गिरती हैं


हर बार मन तय करता है
 हर बार लड़खड़ाते हुए
कहीं और
कहीं और भटकता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज


कुछ एक पाए थे जिनपर
किसी की झोपड़ी टिकी है
अब जो वो भी हिल रहे हैं
तो मन
उन्हीं से लिपटता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज


जो बदल पाए हैं अबतक
उसी से मुत्तमईन नहीं हैं
जो मिल सका न हमको
उस ओर
सफर निकलता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज








Monday, December 1, 2014

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया



अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया
होलिया ना रहे रे उदास
बरस-बरस कोरा रही गइल अंगना
कब ले करीं हम आस

चउखट सूना रहे सूना रहे घरवा
अंखवा रहेला उदास
जाने कौन बेरा होई सुनहे हो राम जी
बानी हम अंचरा पसार

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया..

कोनो रंग चढ़े नाही, मन में जीवन में
कोनो गीत सरगम न ताल
जोने कब फगुआ सुनाई हमरो दुअरा
जाने कब बाजी कौनों झाल

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया...

बरस भईल अब काटे ला दलनवा
तहरा के खोजे दिन रात
अबकी न अईब त जाने कब अईब
केकरा से कहीं मन के बात

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया...

काहे कईल नोकरी बन परदेसिया
माई माटी दूनो से तू दूर
जाने कब सुनब तू इनके अरजिया
कब ले इ मन मजबूर

अबकी फगुनवा में अईह तू बिदेसिया
होलिया ना रहे रे उदास
बरस-बरस कोरा रही गइल अंगना
कब ले करीं हम आस
                                                   -   रवि मिश्रा ( 01.12.2014)


Sunday, November 30, 2014

भोर भईल


भोर भईल अब जाग साथी
रात अन्हरिया भागल साथी

पहिला किरण से जग उजियारा
दूर कहीं छुप गएल अंधियारा
घोर निरासा भागल साथी
आस के लाली छा गएल साथी

भोर भईल अब....

लेके के हरि के नाम तू जाग
जीवन के ताल पर तू हो भाग
एगो नया दिन आ गएल साथी
जीवन दर्शन बुझा गएल साथी

भोर भईल अब....

रात के बाद उजाला ही होला
जग के गति कभो कहंवा रुकेला
कर्म में अपना लाग हो साथी
इहे धरम बा जान हो साथी

भोर भईल अब....

सुख जइसे अंतिम सच ना ह
दुख भी ओइसे ही अमर कहां ह
चक्र चलेला हर दम हो साथी
करत जा आपन करम हो साथी

भोर भईल अब....













Friday, November 28, 2014

भोजपुरी का ह...




भोजपुरी का  ह
परदेस में मजदूर के मन के आसा ह
जौन कान में घुलजाए उ बतासा ह
इ बस बोली ना आपन मन के भासा ह

भोजपुरी का ह
उमंग, उत्साह , जीवन के संचार ह
दिल के गंगा जुबान से बहे उ प्यार ह
आचार ह , विचार ह ,व्यवहार है, आपन संसार ह

भोजपुरी का ह
लड़काई में दुलार के नाम ह
ए संसार में आपन पहचान ह
आन ह, बान ह , सान ह

भोजपुरी का ह
आपन जड़ ह, जवार ह
एगो बंधन हमार तहार ह
पोखर,घाट, बगईचा, अंगना दुआर ह

भोजपुरी का ह
छठ ,दिवाली, ईद, मुहर्रम ह
हर बिदेसिया के मन के मरहम ह
दया, प्रेम ,भाईचारा मेहनत ,परिश्रम ह

भोजपुरी का ह
सरसों, मकई, मसूरिया ,धान ह
खेत में पसीना बहावे उ किसान ह
सबके पेट भरे ओकरा के एगो प्रणाम ह

भोजपुरी का ह
सतुआ-सतुई, अचार , खटमिट्ठी ह
दही ह , चिउड़ा ह , चोखा लिट्टी ह
हर निवाला में प्रेम बा उहे मिट्टी ह

भोजपुरी का ह
माई-बाबू जी के दुलार ह
जीवन में सुख के बयार ह
हमार अस्तित्व ह, हमार आधार ह

-    रवि मिश्रा (29.11.2014)




Tuesday, September 16, 2014

बोलो सारण कब जागोगे


इस धरा को जब
अपने पुत्रों से मान न होगा
जब किसी ह्रदय में
खुद का ही सम्मान न होगा
जब मरुध्वज के आदर्शो की
हर चौराहे चिता सजेगी
जब दानी दधिचि का भी
नित दिन नित पल अपमान ही होगा

बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे.

जब सड़कों का कीचड़ उठकर
जन के जाके मन में सड़ेगा
जब भ्रष्टाचारी कोई जानवर
हर गरीब की आंते पकड़ेगा
जब होने का हमको ही
कोई भान न होगा
इस भूमि की संतान हैं हम
इसका ही अभिमान न होगा


बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे.

जब आखिरी लौ भी बुझ जाएगी
जब काली रात हर सूरज खाएगी
सत्ता के आगे हर सिर झुक जाएगा
हक मांगने वाला कोई भी स्वर
यहां नहीं उठ पाएगा

बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे

तुम देखो चारो ओर जरा
कितनी लूटी गई है धरा
हक मारा है किसने तेरा
पहचान यहां है कौन लुटेरा
जब गंदे नालों का पानी
रगो में बनकर खून बहेगा
जब अंधी बस्ती बन जाएगी
ये नगरी अंधे लोगों की

बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे

                                              -  रवि मिश्रा उर्फ 'सारण कुमार'

Thursday, May 29, 2014

चलों मिलकर गांठें सुलझाएं


चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं
जिन पर न हुई बहस अबतक
वो मसले सरे-आम उठाएं
चलों मिलकर गांठें सुलझाएं


मेरी खताओं का हिसाब तुम लेना
अपने गुनाहों का जवाब तुम देना
उस दिन न हो दरम्यां हमारे कोई
खुल के कहना रखना साफगोई
जख्मों के पैबंद खुले तो खुले
अपने -अपने दर्द एक दूजे को दिखाएं
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं





ये बेवजह के फिक़रे, ये बिन वजह के ताने
कहां से आएं गली-मुहल्लों के बीच कौन जाने
कुछ देर तुम भी खामोश रह लेना
मुंह बंद, हों ताले मैं भी कुछ कहूं ना
और कहूं तो लफ्ज नहीं अमृत हो
सदियों की कोई आग पलकभर में बुझ जाए
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं


पीढ़ियों का गुनाह कब तक कोई ढोए
इसी मंजर पे आके कब तक कोई रोए
तुम एक कदम बढ़ा देना लकीरों से आगे
मैं फासले पीछे छोड़ दूंगा तुम्हारा साथ पाके
तलवे कांटों से घायल हों तो हों
अब एक दूसरे के जख्मों को सहलाएं
चलो मिलकर आज गांठें सुलझाएं

                                                                        - रवि मिश्रा(29-05-14)





Wednesday, May 7, 2014

बात बनत जाई


लूट लेलख देखीं, खेत खलिहान
सूख गएल देखीं, मजदूर आ किसान
खून के रंग भी, बदल गईल साथी
बांट देलख सबके, देखीं जाती-पाती

केकरो त पेट एगो, ढोए ना ढोआए
केकरो से खा-खा के चलल भी ना जाए
बाप-माई पोसे ले जवान बेटा-बेटी
काम न मिलल इहां, कमाए नाहीं रोटी

पईसा के प्रेम से , दाम लागे उंचा
दहेज बिना इंहवा, मुड़ी होखे नीचाझ
झूठ-मूठ शान बा, झूठवे के नाम बा
सच बोल देब त, न जान के अमान बा

आज चल देख ल, गंउवा- जवार के
टूट रहल बा इहां, बंधन सब प्यार के
भूख बढ़ गईल जहां, दुख बढ़ गईल उहां
पानी कोई पूछी ना, जईब अब तू कहां


छोड़ का करब तू , केतना बदलब तू
हर कोसिस के हार भएल, कबले यूं चलब तू
ना त चल के पूछ ल, केकर इ दोस बा
के बा अपराधी, काहे इ रोस बा


बाहर ना देखके, अपना से पूछ ल
आपन बुराई से, पहिले तू जूझ ल
कबतक अंहरिया के , राह चलत जाई
तू बदल जईब, सब बात बनत जाई


               -    रवि मिश्रा (07.05.2014)झ