Monday, February 25, 2019

प्यासी भीड़ की सरकार

फटे लिबास
और फटी जेब
फटी आंखों की
सजल उम्मीदें
सिंहासन को
देख रहा थीं
धूल उड़ाते
 पवनयान
क्या करते
 सपने साकार
उसी जेब का
वही पसीना
खूब लुटाते
बारम्बार
फिर देखी
एक प्यासी भीड़
और रूबरू थी
उसकी सरकार.

Saturday, February 23, 2019

कुछ अनकहा रहने देना

कुछ एक शब्द शायद छिटक के
तुम तक पहुंच भी जाएेंगे मगर
जताना कि उन्हें समझा ही नहीं
अब जाके धुंधली हुई है लकीरें
दिखाना कि वो कभी थीं ही नहीं

कुछ एक टुकड़े साझा सपनों के
जो पांव में चुभ जाएें  मगर
जताना कि कुछ हुआ ही नहीं
मेरे घर से निकली हवाएं जो टकराएं
बताना कि किसी ने तुमको छुआ ही नहीं

जरूरी नहीं कि सबसे हम विदा ही कहें
कुछ भरम रहे दरम्या मगर
बताना कि कोई रिश्ता कहां था
जो कभी किसी ने पूछा अगर
समझाना कोई वास्ता कहां था

फिर जो मन की कोठरी में
साथ पाओ तो अगर
छुपाना कि कुछ सोचा कहां था
हृदय को तब छलोगे मगर
इस छल से अब बचना कहां था.
                      - रवि मिश्रा