Thursday, March 6, 2014

दिल की बात सुनो

दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

जब पांव कहीं पे रूकना चाहें
मन यादों से ने छूटना चाहे
औरों को जो लगे अंधेरा
और तुम ढ़ूढ़ों उसी जगह
बीता हुआ वही सवेरा
रूक जाऊं या क़दम बढ़ाऊ
खुद के लिए जीऊं
या फिर दुनियां के नियमों के लिए
सांस लूं और मर जांऊ

ये जाल न जब टूटे
दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

जो छोड़ गये राहों में
सूखी , अकेली ,काटती
इन रास्तों की बाहों में
मिलते है फिर भी लोग
कोई हथेली अपनी नहीं क्यों मिलती
के फिर से थाम थोड़ा और जी जाऊं

मन जो ये उलझन न बूझे
 दिल की बात सुनो
जब राह नहीं सूझे

दिल का कोई कोना ख़ाली क्यों है
और उसे नहीं भरने की ज़िद भी
कोई और क्यों उस कमरे में जाये
कोई नई ताज़ी हवा न आये
सो खिड़कियां दरवाज़े सब
बंद किये हैं सालों से
और उसमें दिवारों को सजाया है
जवाब न मिलने वाले सवालों से

फिर जब कुछ सवाल जवाबों के लिए चीख़े
दिल की बात सुनों
जब राह नहीं सूझे

तुम चले जाना.....



तुम चले  जाना
कि जब शाम की आखिरी किरण
खुद को बिस्तर में छुपा ले
जब परिंदें अपने घोंसलों का रूख करें
कि जब गली के मोड़ पर हमराह विदा लें

तुम चले जाना
कि जब खिड़कियों से
लौ उचक कर झांकने लगे
दूर किसी झोपड़ी के चूल्हों का धुआं
रात का संदेशा बांचने लगे

तुम चले जाना
कि मै चाहता हूं ये रात
मेरी बनी रहे
क्योंकि दिन बड़ी मुश्किल से आता है यहां
तुम्हारे लिए उजाले हों
रौशनी हो, तुम रहों जहां

तुम चले जाना
कि अंधेरों से मेरा पुराना वास्ता है
ये मेरा है
तुम्हारे लिए नहीं ये कठिन रास्ता है

तुम चले जाना
कि मै तुमको गिरता नही देख पाउंगा
मेरा क्या है
इन काली राहों पर
गिरता रहा हूं, फिर से गिर जाउंगा

तुम चले जाना
कि इसके आगे दिन-रात की सरहदें हैं
कुछ लकीरे हैं
जो बांट देती है नजृर और नज़रिये को
तुम्हारी नज़रों में सूरज के नज़ारे हों
उजाले हों, खुशियां हों
जो हक़ीक़त बनते हैं
ऐसे सपने हज़ारों हों
इसलिए ...........
तुम चले जाना

-रवि मिश्रा

सोने दो



सुबह की पलकें खोले कौन
 हिंडोले में ना डोले कौन
पुतली को सोने दो
सपना है , सपना ही सही
होने दो, आज मुझे सोने दो

बड़े दिनों के बाद
ये लहरें चौखट तक आयीं हैं
कोई बदरी मेरे छत की
इस दूर देस में छाई है
खाली हैं, खाली ही सही
होने दो,
आज मुझे सोने दो

इक धान की बाली फूट गई
और मेरे तकीये पर बिखर गई
लाल लाल एक धूप सुबह की
अलसाई पलकों में उतरी
उतरी और निखर गई
और इंद्रधनुष का एक घेरा भी है
झूठा है, होने दो
आज मुझे सोने दो

पैरों में लगी फिर गीली मिट्टी
बीते कल से आई है चिठ्ठी
लिखा बहुत कुछ अक्षर-अक्षर
भरे लिफ़ाफे परियों के पर
नानी ने भेजे होंगे
वरना कौन करेगा
बड़े हुए हम बच्चों की फ़िकर
बातें हैं, होने दो
आज मुझे सोने दो

-रवि मिश्रा