Tuesday, August 20, 2013

प्रश्न


जे ना पाइल हक-हकूक
सहत रहल रौब-रसूख
जे ना भइल कभी बराबर
भोगत रहल सदा निरादर

उ हृदय ना मनाई जश्न
उ हृदय उठाई प्रश्न

बीतत गएल बरस-बरस
जन-गण के मन तरस-तरस
सिकुड़ल पेट ना भोगे अन्न
ढ़क ना पाएल उघाड़ तन

दरिद्रता के ना लगाई भस्म
उ ह़दय उठाई प्रश्न

चुपचाप न रह पाई उ अब
गुमनाम न बन जाई उ अब
अब समय के धार मोड़ दी
शुष्क शिला पर प्रहार छोड़ दी

ना ढोई शोषण के रस्म
उ हृदय उठाई प्रश्न

रवि मिश्रा- 20.08.13










Friday, August 9, 2013

याद के जंगला

अढ़उल के फूल पर जइसे
भोर बिहाने फिर ओस अंघुआए
बांस के कोपर में जइसे
कोई मुंहवा छुपाए, शरमाए

तन-मन चमक जाए
पियरी माटी से जइसे
सबकुछ गमक जाए
बगईचा के मोजर से जइसे

फगुआ,सोहर,चइता सबकुछ
जइसे बसे फिर हर मन में
परदेस में देस के रंगत
ना छूटे इ तन से

जनसमुद्र के पार कहीं से
जइसे गंगाजी बुलावे ली
जइसे आपन पानी से
मन के रोज भिगावे ली

उहे बथानी, उहे मड़ईया
उहे झुंड, सब साथी भईया
खेत बघार, उ घर दुआर
छूट गईल गंउवा के दुलार

सच सब बा, सब सपना बा
ना होके भी, अपना बा
रह रह के झांके, मन डोले
उड़ जाए के चाह में इ अब
याद के जंगला खोले

           - रवि मिश्रा ( 0908.2013)