जे ना
पाइल हक-हकूक
सहत
रहल रौब-रसूख
जे ना
भइल कभी बराबर
भोगत
रहल सदा निरादर
उ हृदय
ना मनाई जश्न
उ हृदय
उठाई प्रश्न
बीतत
गएल बरस-बरस
जन-गण
के मन तरस-तरस
सिकुड़ल
पेट ना भोगे अन्न
ढ़क ना
पाएल उघाड़ तन
दरिद्रता
के ना लगाई भस्म
उ ह़दय
उठाई प्रश्न
चुपचाप
न रह पाई उ अब
गुमनाम
न बन जाई उ अब
अब समय
के धार मोड़ दी
शुष्क
शिला पर प्रहार छोड़ दी
ना ढोई
शोषण के रस्म
उ हृदय
उठाई प्रश्न
रवि
मिश्रा- 20.08.13
