मैं उस तन नाहीं
जो बस नार सरीखा लागे
उस नदिया का रूप नहीं
जो बस धार सरीखा लागे
रूई सा भी भार नहीं
और भार उठा ले जाऊं धरा का
पंखुड़ से भी कोमल हूं
और पावक पथ पर न जलूं जरा सा
सागर से भी गहरा तल
अंबर से भी विशाल है आंचल
आंचल में प्रेम, ममता, निर्मलता
निर्भय, निष्ठा, दया, सजलता
मृत्युलोग का मोक्ष यज्ञ
कर्मकांड, सस्कार सभी
हर काल, समय मुझसे ही पूरा
न होऊं, तो जग है अधूरा
अबला, सबला, काली, दलित
पुलकित, कंचन, संरक्षित, पल्लवित
देह के रूप नहीं मेरे हैं
ये तो नारी का है मन
नारी मन मेरा
जो काया की सीमा से आगे
नारी का मन मेरा
जो माया की सीमा से आगे
लुटता-मिटता हर बार यहां जो
तन से ज्यादा वही मन है
और ये मन हर ह्दय में बसता
जिसने पाया वही जीवन है.
- रवि मिश्रा
कड़ी धूप वाली
धरती धूल वाली
दोपहर जो ऊंघी
पलक बंद कर सोने वाली
वही जेठ फिर से जी जाने का मन है.
घरों से निकलके
जलते तलवों पे चलके
यारों दोस्तों से मिलके
कभी खुसफुसा के
तो कभी वो हल्ला मचाने का मन है.
नींबू पानी की धारें
बचकानी जीभ के चठखारे
आम का पन्ना
फेरी वाले का ठंडा
फिर जीभ को आज ललचाने का मन है.
स्कूल न जाना
रोज छुट्टियां मनाना
हम से ही भरे वो खाली से दिन
मन की करें वो मवाली से दिन
आज गली की पछुवा में झुलस जाने का मन है.
- रवि मिश्रा