Thursday, May 2, 2019

क्या गलत, क्या सही

पत्थरों के बीच हूँ
पत्थर नहीं हूँ
बद बहुत है आसपास
पर बदत्तर नहीं हूँ
जलता बहुत हूँ रोज़
पर आग मैं नहीं हूँ
गीतों का एक शब्द हूँ
 कोई राग मैं नहीं हूँ

बहता तो हूँ मगर
दरिया नहीं हूँ
देखता बहुत हूँ मैं
पर नज़रिया नहीं हूँ
चलता हूँ भीड़ में
मैं  अकेला कहाँ हूँ
सब जहां हैं पहुँचे
अब मैं भी वहां हूँ

रास्ते बहुत हैं अपने
मैं राही नहीं हूँ
कुछ अमिट सा लिखूं
वो सियाही नहीं हूँ
कतार में खड़ा हूँ
कोई कारवां नहीं है
कुछ भी थमा नहीं है
पर कुछ भी रवां नहीं है

अब तक मिला बहुत है
फिर भी गिला बहुत है
समंदर है साथ अपने
और प्यास भी वही है
जिसके लिए चले थे
 मंज़िल वो अब कहीं है
बदला बहुत है खुद को
पर बदला बहुत नहीं है
अब तक किया जो मैंने
न जाने क्या ग़लत
न जाने क्या सही है