कड़ी धूप वाली
धरती धूल वाली
दोपहर जो ऊंघी
पलक बंद कर सोने वाली
वही जेठ फिर से जी जाने का मन है.
घरों से निकलके
जलते तलवों पे चलके
यारों दोस्तों से मिलके
कभी खुसफुसा के
तो कभी वो हल्ला मचाने का मन है.
नींबू पानी की धारें
बचकानी जीभ के चठखारे
आम का पन्ना
फेरी वाले का ठंडा
फिर जीभ को आज ललचाने का मन है.
स्कून न जाना
रोज छुट्टियां मनाना
हम से ही भरे वो खाली से दिन
मन की करें वो मवाली से दिन
आज गली की पछुवा में झुलस जाने का मन है.
- रवि मिश्रा