विप्र सुदामा वेटिंग रूम में थे
तभी कृष्ण का लेटर मिला
राजमहल के मित्र कृष्ण ने
बाल सखा सुदामा नहीं
एक ब्राह्मण को पत्र लिखा
हे सुदामा!
महल द्वार तक आए हो
मेरे लिए क्या लाए हो
तुम मित्र हो मेरे प्रिय सखा
एक थाल में हमने
कभी भोजन था संग चखा
पर आज यहां मैं राजा हूँ
मेरी कितनी मजबूरी है
तुम सवर्ण हो फिर कलयुग में
इसी बात की दूरी है
मन जानता है मुझे
प्रेम है तुमसे
पर अपनी पीड़ा
कहूँ मैं कैसे
तुमको गले लगाया तो
मैं दलित विरोधी कहलाउंगा
और सुदामा
तुम्हारे कारण
अगला चुनाव हार जाउंगा
मेरी जाति मेरा यदुवंश
मुझसे दूरी कर लेगा
कोई पिछड़ा कभी मुझे
अपना वोट नहीं देगा
हाथ मेरे बांध दिए हैं
सत्ता की जंजीरों ने
राजमहल में कैद हूँ मैं
घिरा हूँ कितनी लकीरों में
हाँ!
एक रास्ता है अभी
मिल सकता हूं मैं तभी
त्याग दो ये गेरूआ
त्याग दो तुम शिखा
त्याग तो ये यज्ञोपवीत
त्याग दो अपना वंश अतीत
धर्म बदल लो तो बेहतर है
कर्म बदल लो तो बेहतर है
तब मैं जनता के समक्ष
तुमको गले लगाऊंगा
पिछड़े होने का सर्टिफिकेट
तुम्हारे लिए बनाऊंगा
मेरे वोटबैंक पर भी
कोई आंच न आएगी
ओ भोले!
मेरे मित्र सुदामा
ब्राह्मण होने की बदनामी
मुझको नहीं डराएगी
मित्र हो तुमसे मैं अपने
मन की बात बताता हूँ
तब की बात अलग थी
अब मैं लोकतंत्र का खाता हूँ
बस छोटी मजबूरी है
इसी वजह से दूरी है
तुम अछूत हो लोकतंत्र के
तुम अनटचेबल इस तंत्र के
आज मैं यूं मजबूर हूँ मित्र
राजनीति वश दूर हूँ मित्र
नथिंग पर्सनल
तुम्हारा कालजयी मित्र
कृष्ण
सुदामा पत्र को देख रहा
मन ही मन ये सोच रहा
फटी हुई इस थैली में
जो चना वो वो ले के आया था
जिसको द्वापर में माधो के संग
खूब मज़े खाया था
उसको कैसे लौटा ले जाऊँ
निर्धन विप्र सुदामा सोचे
वही पुराना मित्र कन्हैया
इस भारत में कहां से पाऊँ
- रवि मिश्रा