भगवान शुरू में आये तो सेक्यूलर ही थे। फिर सभ्यताओं के बर्चस्व की लड़ाई
में वो धीरे-धीरे वो नॉन-सेक्यूलर की कैटेगरी में आ गये। आज जब देश की
राजनीति ने भगवानों को आगे कर वोट का प्रसाद पाने की मुहीम छेड़ रखी है,
जिसमें सिर्फ़ हिंदूवादी नेता ही नहीं बल्कि अल्पसंख्यक वर्ग के झंडाबरदार
भी है, पब्लिक में भारी कनफ्यूज़न है।किस गुट में जायें? यहीं नहीं बीच में
रहने वाले स्वयंभू सेक्यूलर नेता लोग भी एक अलग फ्रंट बनाये हुए हैं। इस
बीच कुछ सेक्यूलर देवताओं ने अच्छी ख़ासी लोकप्रियता बटोरी है। लोग किसी
रिस्क में नहीं पड़ना चाहते। कनफ्यूज़न से बाहर निकलना चाहते हैं। ऐसे में
सहारा बनते है यही सेक्यूलर भगवान। राजधानी दिल्ली में इन दिनों सबसे
ज्यादा रेटिंग प्वाईंट साईं बाबा बटोर रहे हैं। यहीं हालत महाराष्ट्रा,
दक्षिण भारत के राज्य और धीरे-धीरे उत्तर भारत में भी देखने को मिल रही है,
जहां इन नॉन सेक्यूलर भगवानों का बोलबाला रहा है। साई बाबा के मंदिरों में
जिस तरह की भीड़ और हाई प्रोफाईल मैनेजमेंट नज़र आता है, उससे उनकी
लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। साईं एक सेफ साईड हैं। अभी तक
किसी भी राजनीतिक दल या धार्मिक संगठन ने साई पर अपना दावा नहीं ठोका है।
ठोकेंगे कैसे ,जगह ही नहीं है। तो भक्तों को इससे बड़ा लाभ है। भक्ति की
भक्ति और किसी का वोट बैंक बनने या कहलाने से मुक्ति। हालांकि साई के
काम्पीटीशन में शनि महाराज भी है। साथ ही हैं कुछ बाबा टाईप लोग। नाम लेना
सेफ़ नहीं हैं क्योंकि उनके भक्तों की संख्या भी अच्छी ख़ासी है इनक्लूडिंग
नेता, अभिनेता और बाहुबलि। इसके अलवा कुछ पीर मज़ार भी हैं जो सेक्यूलर
भगवानों की कैटेगरी में शामिल किये जा सकते हैं। सवाल है कि इनकी
पॉपुलैरिटी इस राम के देश में जिनको भी कुछ दलों नें अपने लिए पेटेंट करा
लिया है, कैसे बढ़ती जा रही है। दिल्ली के लोधी कॉलोनी के साईं टेंपल जाईये
गुरूवार को। दिमाग की सारी बत्तियां खुल जायेंगी। बहरहाल एक कारण जो मेरे
दिमाग में है वो ये है कि लोग पहले तो 'किस पथ जाऊं' वाले सवाल की तर्ज पर
कंफ्यूज़ हुए फिर धीरे- धीरे बोर भी । लोगों को कुछ नया चाहिए था जिसमें
भगवान और उनके बीच किसी का हस्तक्षेप न हो। मामला डीटीएच का था यानि
डायरेक्ट टू हार्ट। बीच में कोई रूकावट के लिए खेद नहीं चाहिए था। अपने
टाईप के नियम हों, अपने टाईप की पूजा। बस इस टाईप में सबसे परफ़ेक्ट नज़र
आये सेक्यूलर भगवान साईं बाबा। बाबा को चढ़ने वाले प्रसादों में आप भक्तों
की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति देख सकते हैं आप। अभी तो साईं की भक्ति अपने चरम
पर है। डर इस बात का है बढ़ती भक्तों की संख्या और दान उन्हे किसी कैटेगरी
में न डाल दे। किसी दल ने अगर उन्हे पेटेंटे करने का दावा ठोका तो जनता
कहां जायेगी। किसी और सेक्यूलर भगवान की तलाश में ।