Tuesday, July 7, 2015

कुछ तो चटकता है हर रोज

कुछ तो चटकता है हर रोज
जैसे पुरानी कोई दीवार हो
और सूखी पपड़ियां
टूट के गिरती हैं


हर बार मन तय करता है
 हर बार लड़खड़ाते हुए
कहीं और
कहीं और भटकता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज


कुछ एक पाए थे जिनपर
किसी की झोपड़ी टिकी है
अब जो वो भी हिल रहे हैं
तो मन
उन्हीं से लिपटता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज


जो बदल पाए हैं अबतक
उसी से मुत्तमईन नहीं हैं
जो मिल सका न हमको
उस ओर
सफर निकलता है हर रोज
कुछ तो चटकता है हर रोज