इस धरा को जब
अपने पुत्रों से मान न होगा
जब किसी ह्रदय में
खुद का ही सम्मान न होगा
जब मरुध्वज के आदर्शो की
हर चौराहे चिता सजेगी
जब दानी दधिचि का भी
नित दिन नित पल अपमान ही होगा
बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे.
जब सड़कों का कीचड़ उठकर
जन के जाके मन में सड़ेगा
जब भ्रष्टाचारी कोई जानवर
हर गरीब की आंते पकड़ेगा
जब होने का हमको ही
कोई भान न होगा
इस भूमि की संतान हैं हम
इसका ही अभिमान न होगा
बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे.
जब आखिरी लौ भी बुझ जाएगी
जब काली रात हर सूरज खाएगी
सत्ता के आगे हर सिर झुक जाएगा
हक मांगने वाला कोई भी स्वर
यहां नहीं उठ पाएगा
बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे
तुम देखो चारो ओर जरा
कितनी लूटी गई है धरा
हक मारा है किसने तेरा
पहचान यहां है कौन लुटेरा
जब गंदे नालों का पानी
रगो में बनकर खून बहेगा
जब अंधी बस्ती बन जाएगी
ये नगरी अंधे लोगों की
बोलो सारण क्या तब जागोगे
बोलो सारण तुम कब जागोगे
- रवि मिश्रा उर्फ 'सारण कुमार'