नहीं रहा अब मैं भी, अंजान दिल्ली में
बनने लगी है थोड़ी पहचान दिल्ली में,पापा के पैसौं से नहीं, खुद की कमाई से सही
अट्टालिकाओं के बीच,ले लिया है किराए का मकान दिल्ली में,
पहले की तरह भीड़ से भरी सड़कें
नहीं लगती हैं मुझको सुनसान दिल्ली में,आ जाती है मुस्कान दिल्ली में,
गले में कंपनी का पट्टा
दिलाता है अलग आत्मसम्मान दिल्ली में,होती होगी बंदी सरकारी ऐलानों में कहीं
दो अक्टूबर को तो हर ओर छलकते हैं यहां जाम दिल्ली में,जनता के सेवक संसद में आ के
बन जाते हैं मालिकान दिल्ली में,लेकिन मैं तो खुश हूं
क्योंकि नहीं रहा मैं भी अंजान दिल्ली में - रवि मिश्रा



